भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 33
  • उपनिषद्का तात्पर्य * १९ षड्विध लिङ्गोंद्वारा ब्रह्ममें तात्पर्य-निर्धारणरूप उपनिषत्-श्रवणसे ही ब्रह्मका साक्षात्कार होता है, अन्य किसी साधनसे नहीं। पूर्वोक्त कारणकलापसहित उपनिषत्-श्रवणसे अवश्य ही ब्रह्मसाक्षात्कार होता है। जैसे श्मशानकी अग्नि और गार्हपत्य अग्निमे पवित्रता-अपवित्रताका महान् अन्तर होता है, वैसे ही मनमानी रेडियो सुनकर या अखबार आदि पढकर उत्पन्न ज्ञान और ब्रह्मचर्य-व्रत गुरुशुश्रूषादि शास्त्रोक्त नियमोंके साथ उत्पन्न ज्ञानमें पवित्रता-अपवित्रता, निर्वीर्यता-वीर्यवत्तरता आदिका महान् अन्तर रहता है। इसीलिये सदाचार स्वधर्म- निष्ठा, तपस्या, उपासना, ब्रह्मचर्य, गुरु-शुश्रूषादि नियमोंके साथ अधिकारीको ही उपनिषदोंका विचार लाभदायक होता है, अन्यथा नहीं। अनधिकारीको तो हानि भी हो सकती है। अज्ञ अर्धबुद्धको उपनिषदोंके महावाक्योंका उपदेश अनर्थकारक होता है— अज्ञस्याल्पप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत्। महानिरयजालेषु स तेन विनियोजितः ॥ उपनिषदोंके महातात्पर्यका विषय अदृश्य अग्राह्य अलक्षण अचिन्त्य अव्यपदेश्य परात्पर शुद्ध ब्रह्म ही है। वही अचिन्त्य अनिर्वाच्य लीलाशक्तिके योगसे अनन्तकल्याणगुणगण- निलय, सगुण एव सौन्दर्य-माधुर्य सौरस्य-सौगन्ध्य-सुधाजल- निधि, अनन्तकोटिकन्दर्प-दर्पदमनपटीयान् साकार भी होता है। सदाशिव, श्रीमन्नारायण, श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण, उमा, रमा, सीता, राधा आदि अनेक रूप उसी परब्रह्मके हैं। इसी- लिये उपनिषदर्थनिर्णायरू ब्रह्मसूत्रोद्वारा विभिन्न आचार्योंने विभिन्न स्वरूपोंसे उसी ब्रह्मका प्रतिपादन किया है। गुरु एवं इष्टकी तथा श्रद्धा, ध्यान, पराभक्तिकी तत्त्वसाक्षात्कारमें अत्यन्त आवश्यकता होती है। 'यस्य देवे परा भक्ति' 'श्रद्धाभक्तिज्ञानयोगादवेहि' जिससे अनन्तकोटिब्रह्माण्डात्मक विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति एव प्रलय होता है, वही उपनिषदर्थ ब्रह्म है। आकाशका कारण अहम्, अहङ्का भी कारण महान्, महान्‌का भी कारण अव्यक्त है। अव्यक्त उपनिषदर्थ ब्रह्मसे उत्पन्न या उसमे ही अध्यस्त होता है। 'तदैक्षत', 'एकोऽहम्' इत्यादिक ईक्षण और अह ही 'महान्' और 'अह' है। अह, महान्, ईक्षण, निद्रा और अव्यक्त—इन सबका साक्षी, भासक, निर्दृग्यमान ही उपनिषदर्थ ब्रह्म है। उस अखण्डबोधस्वरूप भानकी अत्यन्त अवाध्यता ही सद्रूपता, सद्रूप उसी तत्त्वकी अवेद्यत्वे सति अपरोक्षता ही चिद्रूपता और सच्चिद्रूप उसी परमात्मतत्त्वकी सर्वोपप्लव- विवर्जितता ही आनन्दरूपता है। सम्पूर्ण पुरुषार्थोंका चरम लक्ष्य अनर्थवर्जन एव आनन्दप्राप्ति है। निरुपप्लव निरवधि, निःसीम, आनन्द ही ब्रह्म है। सर्वबाधावधि अत्यन्तावाध्यता ही उसकी अमृतता एव सत्यता है। अग्नि, चन्द्र, विद्युत् सूर्यसे भी सूक्ष्म अन्तरङ्ग प्रकाश चक्षुरादि इन्द्रियाँ हैं एवं उनसे भी सूक्ष्म मन, बुद्धि एव अहमर्थ हैं, परतु उन सबका प्रकाशक सबसे सूक्ष्म भान ज्ञानस्वरूप आत्मा है। जैसे दर्पणभानके अनन्तर तस्थ प्रतिबिम्ब भासित होता है, अथवा सौर्रादि आलोकके भानके अनन्तर नील पीत आदि रूप भासित होते हैं, वैसे ही शुद्ध भानस्वरूप प्रत्यग् ब्रह्म-भानके अनन्तर ही अहमर्थ, ईक्षण, अव्यक्त आदि भासित होते हैं। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ घटादिकी अपरोक्षता मनश्चक्षु आलोकादिसापेक्ष है, परंतु प्रत्यक्‌की अपरोक्षता सर्वनिरपेक्ष स्वतः है। 'यत्साक्षाद- परोक्षाद्ब्रह्म' सर्वकारण सर्वाधिष्ठानस्वरूप प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मसे भिन्न सम्पूर्ण जगत् उसी प्रकार मिथ्या है, जैसे रज्जुमें कल्पित सर्पादि रज्जुसे भिन्न होकर सर्वथा मिथ्या हैं। जैसे मृत्तिका ही घट-शरावादिरूपेण, सुवर्ण ही कटक मुकुट- कुण्डलादिरूपेण, जल ही तरङ्गादिरूपेण प्रतीत होते है, वैसे ही भगवान् भी प्रपञ्चरूपेण प्रतीत होते है। आरम्भवाद, परिणामवाद भी तत्त्वनिश्चयके लिये किसी कक्षामें मान्य होते हैं; परंतु क्षपितकल्मप विद्वान् तो विवर्त ही समझता है। जगदाकारेण परिणममाना मायाका अधिष्ठानभूत ब्रह्म ही दृष्टिभेदसे मायाके कारण ही अतात्त्विक अतएव असममत्ताक अन्यथाभावापन्न होनेसे विवर्ताधिष्ठान कहलाता है। रूपान्तर- से चित्तचाञ्चल्यके कारण भी उसमें मिथ्या द्वैत-प्रतिभास होता है। वस्तुतः कार्यकारणातीत नित्यनिरस्तनिखिलप्रपञ्च- विभ्रम, अज, अनिद्र, अस्वप्न, स्वप्रकाश, अपार, अनन्त सद्‌घन चिद्‌घन आनन्दघन ब्रह्म ही सब कुछ है। जैसे बिम्ब-प्रति- बिम्बका भेद प्रतीत होते हुए भी वास्तवमें वह भेद मिथ्या है। बिम्बसे अतिरिक्त प्रतिबिम्ब कोई वस्तु नहीं है। बिम्ब ही प्रतिबिम्बात्मना प्रतीत होता है, वैसे ही जीवात्मा-परमात्माका भेद भी मिथ्या है। वस्तुतः परमात्मा ही उपाधिके द्वारा जीवात्मस्वरूपसे प्रतीत होता है। इसी तरह अहङ्कारादि उपाधिके कारण ही आत्मामे मिथ्या-कर्तृत्व उसी प्रकार प्रतीत होता है जैसे जपाकुसुमादिके ससर्गसे स्वच्छ स्फटिकमें लौहित्य प्रतीत होता है। जिस प्रकार घट-मठ आदि उपाधिमें रहता हुआ भी आकाश वस्तुतः सर्वथा असङ्ग ही रहता है, तद्वत
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