कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
by गीताप्रेस
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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५१८ * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [अध्याय २ सब कार्य करके अर्घ्यपात्रमें दो हरी दूबके अङ्कुर भी रख ले —यों कहकर अपनी दाहिनी बाँहका अन्वावर्तन करे— और निम्नाङ्कित ऋचाओंका जप करे— बारबार घुमाये । तत्पश्चात् बाँह खींच ले ॥ ८ ॥ ‘समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यं भवा वाजस्य संगथे ।'१ अथ अन्य प्रकारकी उपासना बतायी जाती है—पूर्णिमाको ‘सं ते पयांसि समु यन्तु वाजा संवृष्ण्यान्यभिमातिषाह.। सायंकालमें जब प्राची दिशाके अङ्कमें चन्द्रदेवका दर्शन होने आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व ॥'२ लगे, उस समय इसी रीतिसे (जो पहले बतायी गयी है ) 'यमादित्या अंशुमाप्याययन्ति यमक्षितमक्षितयः पिबन्ति । चन्द्रमाका उपस्थान करे—उन्हें अर्घ्य प्रदान करे । उपस्थानके तेन नो राजा वरुणो बृहस्पतिराप्याययन्तु भुवनस्य गोपाः ॥'३ समय निम्नाङ्कित मन्त्रोंका पाठ भी करे— —इन तीन ऋचाओंका जप करनेके पश्चात् चन्द्रमाके सोमो राजासि विचक्षणः पञ्चमुखोऽसि प्रजापति- सम्मुख दाहिना-हाथ उठाये और निम्नाङ्कित मन्त्रका र्ब्राह्मणस्त एकं मुखं तेन मुखेन राज्ञोऽत्सि तेन मुखेन मामन्नादं पाठ करे— कुरु । राजा त एकं मुखं तेन मुखेन विशोऽत्सि तेन मुखेन मास्माकं प्राणेन प्रजया पशुभिराप्याययिष्ठा योऽस्मान् मामन्नादं कुरु । श्येनस्त एकं मुखं तेन मुखेन पक्षिणोऽत्सि द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणेन प्रजया पशुभिराप्याययस्व तेन मुखेन मामन्नादं कुरु । अग्निष्ट एकं मुखं तेन मुखेनेमं इति दैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृतमन्वावर्ते इति । ४ लोकमत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु । त्वयि पञ्चमं मुखं १ हे स्त्रीरूप सोम ! तुम पुरुषरूप सूर्यके तेजसे वृद्धिको प्राप्त तेन मुखेन सर्वाणि भूतान्यत्सि तेन मुखेन मामन्नाद कुरु । होओ । पुरुषकी उत्पत्तिका हेतुभूत जो वीर्य—अग्निसम्बन्धी तेज है, मास्माकं प्राणेन प्रजया पशुभिरवक्षेष्ठा योऽस्मान् द्वेष्टि वह तुममें स्थापित हो । ( तुम अन्न आदि ओषधियोंके भी स्वामी हो; यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणेन प्रजया पशुभिरवक्षीयस्वेति, दैवी- अत ) सब ओरसे अन्नकी प्राप्तिमें निमित्त बनो । मावृतमावर्तं, आदित्यस्यावृतमन्वावर्ते ।५ २.हे सोम ! तुम सोममयी प्रकृति हो, तुम्हारा उत्तम दुग्ध अथवा इस प्रकार मन्त्रपाठ करते हुए दाहिनी बाँहका अन्वावर्तन जल (जो माताके स्तनोंमें दुग्धरूपसे, चन्द्रमण्डलमें सोमरस अथवा करे ॥ ९ ॥ सुधारूपसे तथा मेघमण्डलमें स्वादिष्ट जलके रूपमें स्थित है ) पुरुष- इस तरह सोमकी प्रार्थनाके पश्चात् ( गर्भाधानके लिये ) मात्रके लिये अत्यन्त उपकारक है तथा उसका सेवन करनेवाले पुरुषोंको पुष्टि प्रदान करके उनके शत्रुओंका पराभव करानेमें भी समर्थ है । ५. विश्वकी स्त्री-पुरुषरूपा प्रकृति—उमाके साथ वर्तमान तुम वे दुग्ध और जल अन्नसे जीवन-निर्वाह करनेवाले—निरामिषभोजी सोम राजा हो । विचक्षण—सम्पूर्ण लौकिक, वैदिक कार्योंके साधनमें जीवोंको सुगमतापूर्वक प्राप्त होते रहें । आग्नेय तेजसे आह्लादको प्राप्त कुशल हो । तुम पञ्चमुख—पाँच मुखवाले हो । प्रजापति—समस्त होते हुए तुम अमृतत्वकी प्राप्तिमें सहायक बनो और स्वर्गलोकमें प्रजाका पालन करनेवाले हो । ब्राह्मण तुम्हारा एक मुख है, उस उत्तम यशको धारण करो । मुखसे तुम क्षत्रियोंका भक्षण करते हो—दमन करते हो, उस मुखके ३ द्वादश आदित्यरूप पुरुष जिस स्त्री-प्रकृतिमय अमूर्तांश द्वारा तुम मुझे अन्नको खाने और पचानेकी शक्तिमे सम्पन्न बनाओ । सोमको अपने तेजसे आह्लाद प्रदान करते हैं तथा स्वय अक्षीण रह- क्षत्रिय तुम्हारा एक मुख है, उस मुखसे तुम वैश्योंका भक्षण— कर कभी क्षीण न होनेवाले जिस सोमका (दुग्ध और जलके रूपमें ) शासन करते हो, उस मुखसे तुम मुझे अन्नका भक्षण करने और उसे पान करते हैं, उस सोममय अश्रुसे, त्रिभुवनकी रक्षा करनेवाले पचानेकी शक्तिसे सम्पन्न बनाओ । बाज तुम्हारा एक मुख है, उस राजा वरुण और बृहस्पति हमलोगोंको आनन्द एव पुष्टि प्रदान करें। मुखसे तुम पक्षियोंका भक्षण—सहार करते हो, उस मुखसे मुझे ४ 'हे सोम ! तुम हमारे प्राण, सतान और पशुओंसे अपनी अन्नका भोक्ता बनाओ । अग्नि तुम्हारा एक मुख है, उस मुखसे तुम पुष्टि एव तृप्ति न करो, अपितु जो हमसे द्वेष रखता है, अतएव इस लोकका भक्षण करते हो, उस मुखसे मुझे भी अन्नका भोक्ता हम भी जिससे द्वेष रखते हैं, उसके प्रागसे, सतानसे और पशुओसे बनाओ। पाँचवाँ मुख तो तुममें ही है, उस मुखसे तुम सम्पूर्ण प्राणियोंका अपनी पुष्टि एव तृप्ति करो । इस प्रकार इस मन्त्रके अर्थभूत देवतासे भक्षण—सहार करते हो, उस मुखसे मुझे भी अन्नका भोक्ता बनाओ। सम्पादित होनेवाली सचरण-क्रियाका मै अनुवर्तन करता हूँ— तुम प्राण, सतान और पशुओंसे हमें क्षीण न करो, अपितु जो हमसे उसीका चलाया हुआ चलता हूँ । अग्नीषोमात्मक सोम ! मै तुम्हारी द्वेष रखता है, अतएव हम भी जिससे द्वेष रखते हैं, उसे प्राण, सचरणक्रियाका अनुवर्तन करता हूँ, अर्थात् तुम्हारी ही गतिका सतान एव पशुओसे क्षीण करो । ( शेष मन्त्रका अर्थ ऊपरकी अनुसरण करता हूँ।' तरह समझना चाहिये ।)