कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५१९ पत्नीके समीप बैठनेसे पूर्व उसके हृदयका स्पर्श करे। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करना चाहिये— यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्त प्रजापतौ। मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं तेन माहं पौत्रमघं रुदम्। 'हे सुन्दर सीमन्त (माँग) वाली सुन्दरी! तुम सोममयी हो, तुम्हारा हृदय (स्तन-मण्डल) प्रजा-संततिका पालक (पोषक) है; उसके भीतर जो चन्द्रमण्डलकी ही भाँति अमृतराशि निहित है, उसे मैं जानता हूँ, अपनेको उसका जाननेवाला मानता हूँ। इस सत्यके प्रभावसे मैं कभी पुत्र-सम्बन्धी शोकसे रोदन न करूँ (मुझे पुत्रशोक कभी देखना न पड़े)।' इस प्रकार प्रार्थना करनेसे उस उपासकके पहले उसकी संतानकी मृत्यु नहीं होती ॥ १० ॥ अथ दूसरी उपासना बतायी जाती है—परदेशमें रहकर वहाँसे लौटा हुआ पुरुष पुत्रके मस्तकका स्पर्श करे और इस मन्त्रको पढ़े— अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे। आत्मा त्वं पुत्र * माऽऽविथ स जीव शरदः शतम् असौ ॥ 'अमुक नामवाले पुत्र! तुम नरकसे तारनेवाले हो। मेरे अङ्ग-अङ्गसे प्रकट हुए हो। मेरे हृदयसे तुम्हारा आविर्भाव हुआ है। तुम मेरे अपने ही स्वरूप हो। तुमने मेरी (नरकसे) रक्षा की है। तुम सौ वर्षोंतक जीवित रहो।' यहाँ 'असौ' के स्थानपर पुत्रका नाम उच्चारण करना चाहिये और नामोच्चारणके समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़ना चाहिये— अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव। तेजो वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम् असौ।' † यहाँ पुनः 'असौ' के स्थानपर पुत्रका नाम लेना चाहिये। साथ ही निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ भी करना चाहिये— 'येन प्रजापतिः प्रजा. पर्यगृह्णादरिष्टयै तेन त्वा परिगृह्णामि असौ। ॐ यहाँ भी 'असौ' के स्थानपर पुत्रका नामोच्चारण करे। तत्पश्चात् पुत्रके दाहिने कानमें इस मन्त्रका जप करे— अस्मै प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्, इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि घेहि। † फिर इसी मन्त्रको बायें कानमें भी जपे। तदनन्तर पुत्रका मस्तक सूँघे और इस मन्त्रको पढ़े— माच्छिथा मा व्यथिष्ठा. शतं शरद आयुषो जीव पुत्र ते नाम्ना मूर्धानमवजिघ्रामि, असौ। 'बेटा! संतान-परम्पराका उच्छेद न करना। मन, वाणी और शरीरसे तुम्हें कभी पीड़ा न हो। तुम सौ वर्षोंतक जीवित रहो। मैं तुम्हारा अमुक नामसे प्रसिद्ध पिता तुम्हारा नाम लेकर तुम्हारे मस्तकको सूँघ रहा हूँ।' (यहाँ 'असौ' के स्थानपर पिता अपना नाम ले।) इस मन्त्रको पढ़कर तीन बार पुत्रका मस्तक सूँघना चाहिये। इसके बाद नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर मस्तकके सब ओर तीन बार हिंकार ('हिम्' शब्दका) उच्चारण करे। मन्त्र इस प्रकार है— गवां त्वा हिंकारेणाभि हिंकरोमि। 'वत्स! गौएँ अपने बछड़ेको बुलानेके लिये जैसे रँभाती हैं, उसी प्रकार—वैसे ही प्रेमसे मैं भी तुम्हारे लिये हिङ्कार करता हूँ—हिङ्कारद्वारा तुम्हें अपने पास बुलाता हूँ' ॥ ११ ॥
दैवपरिमररूपमें प्राणकी उपासना
अब इसके बाद देव-सम्बन्धी 'परिमर' का वर्णन किया जाता है। (यहाँ अग्नि और वाक् आदि ही देवता हैं, ये देवता प्राणके सब ओर मृत्युको प्राप्त होते हैं, अतः ब्रह्मस्वरूप प्राणको ही यहाँ 'परिमर' कहा गया है।) यह जो प्रत्यक्ष रूपमें अग्नि प्रज्वलित है, इस रूपमें ब्रह्म ही देदीप्यमान हो रहा है। जब अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, उस अवस्था में यह मर जाती है—बुझ जाती है। उस बुझी हुई अग्निका तेज सूर्यमे ही मिल जाता है और प्राण वायुमें प्रवेश कर जाता है।
* पुत्रका अर्थ ही है—पुत् नामके नरकसे रक्षा करनेवाला (पुन्नाम्न नरकात् त्रायते)। † मन्त्रार्थ इस प्रकार है—'वत्स! तुम पत्थर बनो, कुठार बनो और विछा हुआ सुवर्ण बनो (अर्थात् तुम्हारा शरीर पत्थरके समान सुगठित, बलवान्, स्वस्थ एवं नीरोग हो। तुम कुठारकी भाँति शत्रुओंका नाश करनेवाले बनो और सब ओर फैली हुई सुवर्णराशिकी भाँति सबके प्रिय बनो। समस्त अङ्गोंका सारभूत, संसार-वृक्षका बीजरूप जो तेज है, वह तुम्हीं हो, तुम सैकड़ों वर्ष जीवित रहो।' * वरन 'प्रजापति ब्रह्माजी अपनी सृष्टिको विनाशसे बचानेके लिये उसे जिस तेजसे सम्पन्न करके परिगृहीत अथवा अनुगृहीत करते हैं, उसी तेजसे सम्पन्न करके मैं तुम्हें सब ओरसे ग्रहण करता हूँ। † मघवन् ! आप सरल भावका अवलम्बन करके इस पुत्रकी रक्षा करें। इन्द्र! इसे श्रेष्ठ धन प्रदान करें।