कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 559, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५२१
[बायाँ स्तम्भ] जाता है, जिस अमृतत्व-गुणसे वे वाक् आदि देवता भी संयुक्त होते हैं ॥ १४ ॥ प्राणोपासकका सम्प्रदान-कर्म अब इसके पश्चात् पिता-पुत्रका सम्प्रदान-कर्म बतलाते हैं ( पिता पुत्रको अपनी जीवन-शक्ति प्रदान करता है; अतएव इसको पितापुत्रीय सम्प्रदान-कर्म कहते हैं ) । पिता यह निश्चय करके कि अब मुझे इस लोकसे प्रयाण करना है, पुत्रको अपने समीप बुलाये । नूतन कुश-कास आदि तृणोंसे अग्निशालाको आच्छादित करके विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करे । अग्निके उत्तर या पूर्वभागमें जलसे भरा हुआ कलश स्थापित करे । कलशके ऊपर धान्यसे भरा हुआ पात्र भी होना चाहिये । स्वय भी नवीन धौत ( धोती ) और उत्तरीय धारण करे । इस प्रकार श्वेत वस्त्र और माला आदिसे अलङ्कृत हो घरमें आकर पुत्रको पुकारे । जब पुत्र समीप आ जाय तो सब ओरसे उसके ऊपर पड़ जाय अर्थात् उसे अङ्कमें भर ले और अपनी इन्द्रियोंसे उसकी इन्द्रियोंका स्पर्श करे ( तात्पर्य यह कि नेत्रसे नेत्रका, नाकसे नाकका तथा अन्य इन्द्रियोंसे उसकी अन्य इन्द्रियोंका स्पर्श करे ) । अथवा केवल पुत्रके सम्मुख बैठ जाय और उसे अपनी वाक्-इन्द्रिय आदिका दान करे । पिता कहे—‘वाचं मे त्वयि दधानि' ( बेटा ! मैं तुममें अपनी वाक्-इन्द्रिय स्थापित करता हूँ ) । पुत्र उत्तर दे—'वाच ते मयि दधे' ( पिताजी ! मैं आपकी वाक्-इन्द्रियको अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'प्राणं मे त्वयि दधानि' ( मैं अपने प्राणको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'प्राणं ते मयि दधे' ( आपके प्राण—घ्राणेन्द्रियको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'चक्षुर्मे त्वयि दधानि' ( अपनी चक्षु-इन्द्रियको तुममे स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'चक्षुस्ते मयि दधे' ( आपके चक्षुको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'श्रोत्रं मे त्वयि दधानि' ( अपने श्रोत्रको तुममें स्थापित करता हूँ ) । उ० अं० ६६—
[दायाँ स्तम्भ] पुत्र—'श्रोत्रं ते मयि दधे' ( आपके श्रोत्रको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'अन्नरसान्मे त्वयि दधानि' ( अपने अन्नके रसोंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'अन्नरसांस्ते मयि दधे' (आपके अन्नरसोंको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'कर्माणि मे त्वयि दधानि' ( अपने कर्मोंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'कर्माणि ते मयि दधे' ( आपके कर्मोंको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'सुखदुःखे मे त्वयि दधानि' ( अपने सुख और दुःखको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'सुखदुःखे ते मयि दधे' ( आपके सुख और दुःखको अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'आनन्दं रतिं प्रजातिं मे त्वयि दधानि' ( मैथुन-जनित आनन्द, रति और सन्तानोत्पत्तिकी शक्ति तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'आनन्दं रतिं प्रजातिं ते मयि दधे' ( आप- की वह शक्ति मैं अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'इत्या मे त्वयि दधानि' ( अपनी गतिशक्ति मैं तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'इत्यास्ते मयि दधे' ( आपकी गतिशक्ति अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'धियो विज्ञातव्य कामान् मे त्वयि दधानि' ( अपनी बुद्धि-वृत्तियोंको, बुद्धिके द्वारा ज्ञातव्य विषयको तथा विशेष कामनाओंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'धियो विज्ञातव्यं कामास्ते मयि दधे' ( आपकी बुद्धि-वृत्तियोंको, बुद्धिके द्वारा ज्ञातव्य विषयोंको तथा कामनाओं- को मैं अपनेमें धारण करता हूँ ) । तदनन्तर पुत्र पिताकी प्रदक्षिणा करते हुए पूर्व दिशाकी ओर पिताके समीपसे निकलता है । उस समय पिता पीछेसे पुत्रको सम्बोधित करके कहते हैं— 'यशो ऽब्रह्मवर्चसमन्नाद्य कीर्तिस्त्वा जुषताम् ।'