भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 560, कुल 832 में से

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पृष्ठ 560

५२२ ⁕ कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् ⁕ [ अध्याय : 'यश, ब्रह्मतेज, अन्नको खाने और पचानेकी शक्ति तथा इसके बाद यदि पिता नीरोग हो तो वह पुत्रके प्रभुत्वमें उत्तम कीर्ति—ये समस्त सद्गुण तुम्हारा सेवन करें।' ही वहाँ निवास करे (पुत्रको घरका स्वामी समझे और पिताके यों कहनेपर पुत्र अपने बायें कन्धेकी ओर दृष्टि अपनेको उसके आश्रित माने)। अथवा सब कुछ त्यागकर घुमाकर देखे और हाथसे ओट करके अथवा कपड़ेसे आड़ घरसे निकल जाय—सन्यासी हो जाय। अथवा यदि वह करके पिताको उत्तर दे— परलोकगामी हो जाय तो जिन-जिन वाक् आदि इन्द्रियोंको 'स्वर्गान् लोकान् कामान् अवाप्नुहि' उसने पुत्रमें स्थापित किया था, उन सभीकी शक्तियोंका वह 'आप अपनी इच्छाके अनुसार कमनीय स्वर्गलोक तथा पुत्र उसी प्रकार आश्रय हो जाता है। वे सभी शक्तियाँ उसे वहाँके भोगोंको प्राप्त करें।' प्राप्त होती हैं (यही सच्चा उत्तराधिकार है) ॥ १५ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥

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