भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 656, कुल 832 में से

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पृष्ठ 656

६०८ * महोपनिषद् * [ अध्याय ३


करनेवाला मन्त्र है—चिन्ताका त्याग करना । ब्राह्मण ! थोड़ा भी चिन्ताका त्याग करनेसे आनन्दकी प्राप्ति होती है और थोड़ी भी चिन्ता करनेसे दुःख प्राप्त होता है। शरीरके समान गुणहीन, नीच तथा शोचनीय वस्तु कोई नहीं है। अहङ्कार- रूपी गृहस्थका यह शरीर महागृह है। पिताजी ! यह नष्ट हो जाय या चिरकालतक रहे—इससे मुझे क्या ? इन्द्रियरूपी पशु जिसमे पक्तिमे बँधे हुए हैं, जिस घरके प्राङ्गणमे तृष्णा चलती फिरती है, चित्तवृित्तिरूपी भृत्यजनोँसे जो समाकीर्ण है—ऐसा यह शरीररूपी गृह मुझे इष्ट नहीं, प्रिय नहीं। यह मुखरूपी द्वार जिह्बारूपी वदरीसे आक्रान्त होकर भयानक बन रहा है। जिसके द्वारपर दाँतरूपी हड्डीके टुकड़े दिखलायी पड़ रहे हैं—ऐसा यह शरीररूपी गृह मुझे इष्ट नहीं, प्रिय नहीं। हे मुनीश्वर ! भीतर और बाहर रक्त और माससे व्याप्त, केवल विनाशशील इस शरीरमें रम्यता कहाँ है, बतलाइये तो ? शरत्कालीन बादलोँकी बिजलीमें तथा गन्धर्वनगरीमें यदि किसीने स्थिरता निश्चित की है, तो वह इस शरीरकी स्थिरतामें विश्वास कर सकता है। बाल्यावस्थामें गुरुसे, माता-पितासे, बड़े लड़कोँसे तथा अन्य लोगोँसे डर लगता है, अतएव शैशव भयका घर है । (युवावस्था मे) अपने चित्तरूपी गुफामे रहनेवाले, नाना प्रकारके भ्रमोमे डालनेवाले इस कामरूपी पिशाचसे बलात् विवश होकर मनुष्य पराजित हो जाता है। बुढ़ापेमें उन्मत्तके समान काँपते हुए मनुष्यको देखकर दास, पुत्र और स्त्रियाँ, बन्धु तथा मित्रगण हँसा करते हैं। बुढ़ापेमें असमर्थताके कारण लालसा बहुत अधिक बढ़ जाती है। यह बुढ़ापा हृदयमे दाह प्रदान करनेवाली सारी आपदाओंकी प्रिय सहेली है। ससारमे जिस सुखकी भावना की जाती है, वह कहाँ है ? आयुको तृणके समान पाकर काल उसे काटता ही जा रहा है। छोटेसे तृण तथा रजःकणको महेन्द्र तथा स्वर्णमय सुमेरु पर्वतको सर्षप (सरसोँ) बना देनेवाला यह सर्वसहारी काल अपना पेट भरनेके लिये सबको आत्मसात् करनेको उद्यत है । तीनो लोक कालके द्वारा आक्रान्त है ॥ २२-३८ ॥

‘यन्त्रके समान चञ्चल अङ्गरूपी पिंजरेमें मासकी पुतलीके समान, स्नायु तथा अस्थिकी ग्रन्थियोँसे निर्मित स्त्रीके शरीरमें कौन-सी वस्तु है, जिसे सुन्दर कहा जाय ? नेत्रमे स्थित त्वचा, मास, रक्त, आँसू—इनको अलग-अलग करके देखो, इनमें कौन-सी वस्तु रम्य है ? फिर व्यर्थ ही क्यो मोहको प्राप्त हो रहे हो। मेरु-पर्वतके शिखरोँके तटसे समुल्लसित होनेवाली गङ्गाजीकी चञ्चल गतिके समान, हे मुनि ! मुक्ताहारका सम्यक् उल्लास जिसमे देखा गया है, काल आनेपर उस ललनाके स्तनको श्मशानके कोनेमे मासके छोटे पिण्डके रूपमें कुत्ते खाया करते हैं! केश और काजल धारण करनेवाली तथा देखनेमे प्रिय लगनेवाली होनेपर भी जिनका स्पर्श दुःखदायी होता है, वे दुष्कृतिरूप अग्निकी शिखाके समान नारियाँ पुरुषको तृणके सदृश जला डालती है। स्त्रियाँ बहुत दूरपर जलनेवाली नरकाग्नियोंकी सुन्दर और दारुण इन्धनस्वरूपा हैं; वे सरस प्रतीत होनेपर भी वस्तुतः नीरस ह । काम नामके किरातने पुरुषरूपी मृगोके अङ्गोको बन्धनमे बाँधनेके लिये स्त्रीरूपी जाल फैला रक्खा है। पुरुष जो जीवनरूपी तलैयाके मत्स्य हैं और चित्तरूपी कीचडमें विचरण करते हैं, उनको फँसानेके लिये नारी दुर्वॉसनारूपी रज्जुमें बँधी बलीशं पिण्डिका (चारे)- के समान है। यह सारे दोषरूपी रत्नोँको उत्पन्न करनेवाला समुद्र ही है। यह दुःखोंकी श्रृङ्खला हमसे सदा दूर ही रहे। जिसके स्त्री है, उसे भोगेच्छा उत्पन्न होती है। जिसे स्त्री नहीं, उसके लिये भोगका हेतु क्या हो सकता ह ? जिसने स्त्रीको छोड़ दिया, उसका ससार छूट गया और ससारको छोड़कर ही मनुष्य सुखी बन सकता है ॥ ३९-४८ ॥

‘दिशाएँ भी नहीं दीख पड़र्ती, देश भी दूसरेके लिये उपदेशप्रद बन जाते है, अर्थात् काल-कवलित हो जाते है; पर्वत भी चूर-चूर हो जाते है, तारे भी टूक टूक होकर गिर जाते हैं । समुद्र भी सूख जाते हैं, ध्रुव नक्षत्रका जीवन भी अस्थायी होता है। सिद्ध पुरुष भी नाशको प्राप्त होते हैं, दानवादि भी जरायस्त हो जाते है। चिरकालस्थायी ब्रह्मा तथा अजन्मा विष्णुभगवान् भी अन्तर्धान हो जाते हैं। सारे भाव अभावको प्राप्त होते है, दिशाओके अधिपति भी जीर्ण शीर्ण हो जाते है। बड़े-बड़े देवता तथा सारे प्राणिवर्ग, जैसे जल वडवानलकी ओर दौड़ता है, उसी प्रकार विनाशकी ओर दौड़ते हैं। क्षणभरमें आपदाएँ आ घेरती हैं और क्षणमें सम्पदाएँ आ जाती है। क्षणभरमें जन्म होता है और क्षणमें ही मृत्यु हो जाती है। यह समस्त प्रपञ्च नश्वर है। इस विश्वमें कायर पुरुषके द्वारा शूरवीर मारे जाते हैं। एकके द्वारा सैकड़ोँका विनाश होता है। विषय-वासनाके कारण चित्तकी विपन्नता ही विष है, विष विष नहीं कहलाता; क्योँकि विष एक जन्मका विनाश करता है और विषय जन्म-जन्मान्तरको नष्ट कर देते हैं। इस समय इस दोषरूपी दावानलसे दग्ध मेरे चित्तमें ऐसा भान हो रहा है। मृगतृष्णा- के सरोवरमे खड़े होनेपर भी मुझमें भोगाशाकी स्फुरणा नहीं होती । अतएव हे गुरुवर ! आप तत्त्वज्ञानके द्वारा मुझे शीघ्र ही बोध प्रदान कीजिये । नहीं तो मान और मत्सरको छोड़- कर, चित्तमें भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए मैं चित्र- लिखितकी भाँति रहकर मौन धारण कर लूँगा’ ॥ ४९-५७ ॥

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥