भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 657

ॐ चतुर्थ अध्याय निदाघके प्रति उनके पिता ऋभुका उपदेश निदाघ मुनिकी बात सुनकर उनके पिता ऋभु मुनि बोले—'ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ निदाघ मुनि ! तुम्हारे लिये अब कुछ अन्य ज्ञातव्य नहीं रह गया है । तुम ईश्वरकी कृपासे अपनी प्रज्ञासे ही सब कुछ जान गये हो । तथापि चित्तकी मलिनतासे उत्पन्न तुम्हारे भ्रमको, हे मुनि ! मैं दूर करूँगा । मोक्षद्वारके चार द्वारपाल बतलाये गये हैं—शम, विचार, सन्तोष और चौथा सत्सङ्ग । पूर्ण यत्नपूर्वक सब कुछ छोड़कर इनमें एकका भी आश्रय पकड़ ले। एकको वशमें करनेसे शेष तीनों वशमें हो जाते हैं । पहले संसार-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये शास्त्रोंके द्वारा, तप और दमके द्वारा तथा सत्सङ्गके द्वारा अपनी प्रज्ञाको बढ़ाये । आत्मानुभव, शास्त्र तथा गुरुके वचनोंकी एकवाक्यताके अभ्याससे निरन्तर आत्मचिन्तन किया जाता है । यदि निरन्तर तुम सङ्कल्प और आगाके अनुसन्धानका त्याग करते हो तो तुम्हें वह पवित्र अचित्तत्व—कैवल्य प्राप्त ही है । चित्तका जो अकर्तृत्व है, वही चित्तकी वृत्तियोंका निरोध अर्थात् समाधि कहलाता है । यही केवल अवस्था है और यही परम कल्याणरूपा परा शान्ति कहलाती है । संसारके समस्त पदार्थोंमें आत्मभावनाका भलीभाँति मनसे परित्याग करके तुम संसारमें गूँगे, अंधे और बहिरे-से होकर रहो । 'सब कुछ प्रशान्त है, एक है, अजन्मा है, आदि- मध्य-हीन है, सब ओर प्रकाशयुक्त है, केवल अनुभवरूप है, अचित्त है, सब कुछ प्रशान्त है'—इत्यादि जो शब्दमयी दृष्टि है, वह व्यर्थ है । आत्मबोधमें बाधक ही है । जो कुछ भी यह दृश्य प्रपञ्च है, तत्त्वतः सब प्रणवरूप है । जो कुछ भी दृश्य यहाँ दिखलायी देता है, वह चिद्-जगत्में दिखलायी देता है । वह चित्‌के निष्पन्दका एक अंशमात्र है । अतएव चित्‌से अतिरिक्त कुछ नहीं है—ऐसी भावना करो । तुम नित्य प्रबुद्धचित्त होकर सांसारिक कार्योंको करते हुए भी आत्माके एकत्वको जानकर प्रशान्त महासिन्धुके समान निश्चल बने रहो ॥१-११॥ 'वासनारूपी तृणका दग्ध करनेवाला अग्नि यह आत्म- ज्ञान ही है । इसे ही 'समाधि' शब्दसे लक्षित करते हैं । चुपचाप बैठे रहना समाधि नहीं है। जिस प्रकार रत्नके इच्छारहित होकर पड़े रहनेपर भी लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं, उसी प्रकार सत्तामात्र परतत्त्वकी ओर सारा जगत् आकर्षित होता है। अतएव हे मुनि ! आत्मामे कर्तृत्व और अकर्तृत्व दोनों हैं । इच्छारहित होनेके कारण आत्मा अकर्ता है और सन्निधिमात्रसे वह कर्ता है। मुनि ! कर्तृत्व और अकर्तृत्व—ये दोनों ब्रह्ममें पाये जाते हैं । जिसमें यह चमत्कार है, उसका आश्रय लेकर स्थिर हो जाओ । अतएव 'मैं नित्य ही अकर्ता हूँ' इस प्रकारकी प्रबल भावनासे युक्त होनेपर केवल परम अमृता नामकी समता ही अवशिष्ट रहती है। निदाघ ! सुनो; जो मत्त्वमें स्थित होकर इस लोकमें जन्मे हैं, वे महान् गुणी हैं । उनकी सदा ही उन्नति होती है तथा वे आकाशमें चन्द्रमाओंके समान सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ १२-१७ ॥ 'सत्त्वस्थ पुरुष रात्रिमें स्वर्णकमलकी भाँति विपत्तिमें कुम्हलाते नहीं । वे प्राप्त भोगके सिवा अन्य वस्तुकी आकाङ्क्षा नहीं करते और शास्त्रोक्त मार्गमें विचरण करते हैं। वे स्वभावतः ही मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा प्रभृतिगुणोंसे सुशोभित रहते हैं । सौम्य ! वे समभावमे रहते हुए निरन्तर साधुवृत्तिमें एकरस बने रहते हैं । समुद्रके समान मर्यादाको छोड़कर वे विशालहृदय हो जाते हैं । वे महात्मा सूर्यनारायण- के समान नियति-पथपर ( नियमानुकूल ) चलते रहते हैं । 'मै कौन हूँ, यह विस्तृत जगत्प्रपञ्च कैसे उत्पन्न हुआ'— संतजनोंके साथ प्राज्ञपुरुष यत्नपूर्वक इन प्रश्नोंपर विचार करे। वह अकार्यमे न लगे, तथा अनार्य पुरुषका सङ्ग न करे; सबका सहार करनेवाले मृत्युको उपेक्षाकी दृष्टिसे न देखे । शरीर, अस्थि, मास तथा रक्त आदिको घृणास्पद समझकर उनकी उपेक्षा करे तथा प्राणिसमुदायरूपी मोतियोंकी लड़ियोंमें सूत्रके समान पिरोये हुए चिदात्मापर ही दृष्टि रक्खे । उपादेय वस्तुकी ओर दौड़ना तथा हेयवस्तुका सर्वथा त्याग कर देना—यह जो मनका स्वरूप है, वह बाह्य है, आभ्यन्तर नहीं, इसको जान लो । चिद्घनके विषयमे गुरु और शास्त्रके द्वारा बतलाये हुए मार्गसे तथा अपनी अनुभूतिसे 'मैं ब्रह्म ही हूँ'—यों जानकर मुनि शोकविहीन हो जाय । इस अवस्थामें शतशः तीक्ष्ण कृपाणके आघात कमलके कोमल आघातके समान सह्य हो जाते हैं, अग्निके द्वारा दाह हिम- उ० अ० ७७-७८-