कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 659, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] *- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६११ है, अतएव जो सङ्कल्प है, वही मन है—यह जान लेना चाहिये । किसीने कभी सङ्कल्प और मनको पृथक् नहीं किया, सारे सङ्कल्पोंके गल जानेपर केवल आत्मस्वरूप ही अवशिष्ट रहता है । म, तू और जगत् इत्यादि दृश्य-प्रपञ्चके प्रशान्त हो जानेपर, दृश्य उस सत्ताको (परतत्त्वको) प्राप्त होता है, तभी वैसा कैवल्य प्राप्त होता है। जब महाप्रलयके समय समस्त दृश्य सत्ताहीन हो जाता है, उस समय सृष्टिके पूर्वकालम केवल शान्त आत्मा ही अवशिष्ट रहता है। जो आत्मसूर्य कभी अस्त नहीं होते, जो जन्मरहित तथा सर्वदोषविवर्जित देव हैं, सर्वदा सर्वकर्ता तथा सर्वस्वरूप हैं, जहाँ वाणी जाकर लौट आती है, जिन्हें मुक्त पुरुष ही जानते हैं, तथा जिनकी आत्मा आदि सञ्ज्ञाएँ कल्पित हैं स्वाभाविक नहीं, वे ही परमात्मा कहलाते हैं ॥ ४२-५७ ॥ 'चित्ताकाश, चिदाकाश और तीसरा (भौतिक) आकाश है। हे मुनि ! आकाश और चित्ताकाशमे भी सूक्ष्मतर चिदाकाश- को जानो । मुनिपुङ्गव ! एक देशसे दूसरे देशमे जानेपर जो बीचमें चित्तका व्यवधान है, उस (बाध) का निमेष होनेपर चिदाकाश ही अवशिष्ट रहता है, यह जानना चाहिये । उस चिदाकाशमें यदि समस्त सङ्कल्पोंको निरस्त करके स्थित होते हो तो निःसन्देह सर्वात्मक शान्त पदको प्राप्त होओगे। चिदाकाशमें स्थित होनेपर जो सुन्दर औदार्य और वैराग्य-रससे युक्त आनन्दमयी अवस्था प्राप्त होती है उसे समाधि कहते हैं। दृश्य पदार्थोंकी सत्ता ही नहीं है—जब इस प्रकारका बोध होता है तथा राग द्वेषादि दोष क्षीण हो जाते हैं, उस समय अभ्यास- बलसे जो एकाग्र-मति उत्पन्न होती है, उसे समाधि कहते हैं। दृश्यकी सत्ताका अभाव जब बोधमें आता है, तब वही निश्चय- पूर्वक ज्ञानका स्वरूप है। वही चिदात्मक ज्ञेयतत्त्व है, वही केवलीभाव अर्थात् आत्मकैवल्य है उसके अतिरिक्त अन्य सब कुछ मिथ्या है। जिस प्रकार उन्मत्त ऐरावत हाथीका सरसोंके एक कोनेके छिद्रमे बाँधा जाना संभव नहीं, सिंहोंके साथ एक धूलिकणके कोटरम मच्छरोंका युद्ध करना असम्भव है तथा कमलकी पखड़ीमे स्थापित सुमेरु पर्वतका भ्रमरशिशुके द्वारा निगला जाना असम्भव कथा है, उसी प्रकार निदाघ ! इस जगत्का अस्तित्वमे आना सम्भव नहीं, इसे तुम केवल भ्रमात्मक जानो । राग-द्वेष आदि क्लेशोंसे दूषित चित्त ही ससार है, वही चित्त जब दोषोंसे विनिर्मुक्त हो जाता है, तब इसे संसारका अन्त अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति कहते हैं। मनसे शरीरकी भावना करनेपर ही आत्मा शरीरी बनता है, जब वह देहवासनासे मुक्त होता है, तब देहके धर्मोंसे लिप्तायमान नहीं होता । मन कल्पको क्षण बना देता है और क्षणमे कल्पत्वको आभासित करता है। यह संसार केवल मनोविलास मात्र है—यह मेरी निश्चित मति है ॥ ५८—६८ ॥ 'जो दुश्चरितमे विरत नहीं हुआ है, जो अशान्त है, समाहित (एकाग्रचित्त) नहीं है तथा जिसका चित्त शान्त नहीं हुआ है, ऐसे मनुष्यको आत्मबोध नहीं होता। प्रकृष्ट कैवल्यज्ञानके द्वारा ही आत्मसाक्षात्कार किया जा सकता है। उस आनन्दमय, द्वन्द्वातीत, निर्गुण, सत्वरूप, चिद्धन ब्रह्मको अपना स्वरूप समझ लेनेपर पुरुष कदापि भयको नहीं प्राप्त होता। जो श्रेष्ठमे भी श्रेष्ठतर, महान्सेभी महान्, तेजोमय स्वरूपवाला, शाश्वत, शिव- स्वरूप (कल्याणकारी), सर्वज्ञ, पुराणपुरुष, सनातन, सर्वेश्वर, एव सब देवताओंके द्वारा उपास्य है, वह ब्रह्म मैं हूँ—इस प्रकारका निश्चय महात्माओके लिये मोक्षका हेतु बनता है। बन्ध और मोक्षके दो ही कारण बनते हैं, ममता और ममताशून्यता । ममतासे प्राणी बन्धनमे पड़ता है और ममतारहित होनेपर मुक्त हो जाता है। जीव और ईश्वररूपसे, ईक्षण (ब्रह्मके सङ्कल्प) से लेकर मङ्गल्यके त्यागतक, सारी जड तथा चेतनात्मक सृष्टि ईश्वरके द्वारा कल्पित हुई है। जाग्रदवस्थासे लेकर मोक्षकी प्राप्तितक समस्त ससार जीवके द्वारा कल्पित है। कठोपनिषद्के त्रिणाचिकैताग्निसे लेकर श्वेताश्वतरके योगतक- के ज्ञान ईश्वरीय भ्रान्तिके आश्रित हैं। लोकायत अर्थात् चार्वाक सिद्धान्तसे लेकर कपिलके साख्यसिद्धान्ततकका दार्शनिक ज्ञान जीवभ्रान्तिके आश्रित है। अतएव मुमुक्षु पुरुषको जीव और ईश्वरके वाद-विवादमे बुद्धि नहीं लगानी चाहिये, बल्कि दृढ होकर ब्रह्मतत्त्वका विचार करना चाहिये । जो पुरुष समस्त दृश्य-जगत्को निर्विशेष चित्स्वरूप समझता है, वही अपरोक्ष ज्ञानवान् है । वही शिव है, वही ब्रह्मा है, वही विष्णु है। विषयोका त्याग दुर्लभ है, तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति दुर्लभ है तथा सद्गुरुकी कृपाके बिना सहजावस्थाकी प्राप्ति दुर्लभ है । जिसकी बोधात्मिका शक्ति जाग्रत् हो गयी है, जिसने सारे कर्मोंका त्याग कर दिया है, ऐसे योगीको सहजावस्था स्वयमेव प्राप्त हो जाती है । जबतक पुरुषको इसमे तनिक भी अन्तर जान पड़ता है, तबतक उसके लिये भय है—इसमें संशय नहीं। सर्वमय सचिदानन्द- को ज्ञानचक्षुसे देखा जाता है, जिसे ज्ञानचक्षु नहीं, वह परब्रह्म- को उसी प्रकार नहीं देख सकता, जैसे अंधेको प्रकाशमान