भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 832 में से

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पृष्ठ 660

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  • महोपनिषद् * [ अध्याय ४ सूर्यनारायण नहीं दीखते । वह ब्रह्म प्रज्ञानस्वरूप ही है, सत्य ही प्रज्ञानका लक्षण है । अतएव ब्रह्मके परिज्ञानसे ही मर्त्य जीव अमरत्वको प्राप्त होता है । उस कार्य-कारणरूप ब्रह्मका साक्षात्कार हो जानेपर पुरुषके हृदयकी गाँठें खुल जाती हैं, सारे संशय दूर हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ६९-८२ ॥ 'अनात्माको त्यागकर, जागतिक स्थितिमें निर्विकार होकर, अनन्यनिष्ठासे अन्त.स्थ सवितृ अर्थात् आत्मचैतन्यमें ही लीन रहो । मरुभूमिमें भ्रमसे दीखनेवाला सारा जल जैसे मरुस्थल मात्र ही रहता है, उसी प्रकार जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिरूप यह समस्त जगत् आत्मविचारसे चिन्मय ही है । जो लक्ष्य बुद्धि तथा अलक्ष्य-बुद्धिका त्याग करके केवल आत्मनिष्ठ होकर रहता है, वह श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी स्वयं साक्षात् शिव है । जगत्‌का अधिष्ठान अनुपम है, वाणी और मनकी पहुँचके परे है, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और अव्ययस्वरूप है । यह संसार सर्वशक्तिमान् महेश्वरका मनोविलास मात्र है । संयम और असंयमके द्वारा जागतिक प्रपञ्च शान्तिको प्राप्त होता है ॥ ८३-८७ ॥ 'मनोव्याधिकी चिकित्साके लिये तुमको मैं उपाय बतलाता हूँ । जिन-जिन वस्तुओंकी ओर मन जाता है, उन उनका त्याग करता हुआ मनुष्य मोक्षको प्राप्त करता है । आत्माधीन होना, एकान्तप्रियता तथा अभिलषित जागतिक वस्तुके त्यागकी भावना जिसके लिये दुष्कर हो जाती है, उस पुरुष कीटको धिक्कार है । केवल अपने प्रयत्नसे सिद्ध होनेवाले अपनी अभिलषित वस्तुके त्यागरूप मनःशान्तिके अतिरिक्त दूसरी शुभ गति नहीं है । सङ्कल्पहीनताके खड्गसे जब इस चित्तको काट दिया जाता है, तब सर्वस्वरूप, सर्वान्तर्यामी, शान्त परब्रह्मकी प्राप्ति होती है । प्रपञ्च- की भावनासे मुक्त होकर, महान् बुद्धिसे युक्त होकर, चित्तका निरोध करके स्थिरभावसे अपनको चिन्मात्रमें स्थित करो । श्रेष्ठ पौरुष अर्थात् अभ्यास और वैराग्यका आश्रय लेकर, तथा चित्तको अचित्तावस्था अर्थात् निरुद्धावस्थामें ले जाकर हृदयाकाशमें ध्यान करते हुए बारबार चेतनमें लगे हुए चित्त- रूपी चक्रकी धारसे मनको मार दो । तब तुम निःशङ्क हो जाओगे और कामादिरूपी शत्रु तुम्हें बाँध न सकेंगे । यह वह है, मैं यह हूँ, वे पदार्थ मेरे हैं—यह भावना ही मन है, इन भावनाओंके त्यागरूपी दावसे मनका नाश किया जाता है । जिस प्रकार शरद्के आकाशमें छिन्न-भिन्न बादलोंके समूह वायुके वेगसे विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार विचारके द्वारा ही मन अन्तर्हित हो जाता है। चाहे प्रलयकालीन उनचास पवन बहें, अथवा सारे समुद्र मिलकर एकार्णवरूप हो जायें, बारहो आदित्य तपने लगे, तथापि मनोविहीन पुरुषकी कोई क्षति नहीं हो सकती । केवल सङ्कल्पहीनतारूपी एक साम्यसे समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, तत्पदका आश्रय लेकर सङ्कल्प- हीनताके विस्तृत साम्राज्यमें स्थित हो जाओ । कहीं भी अचञ्चल मन नहीं दिखलायी देता । चञ्चलता मनका धर्म है, जैसे अग्निका धर्म उष्णता है । यही चञ्चला स्पन्दन- शक्ति चित्तत्त्वमें स्थित है अर्थात् चित्तका धर्म है, इसी मानसिक शक्तिको जगत् प्रपञ्चका स्वरूप समझना चाहिये । जो मन चञ्चलताहीन हो जाता है, वह अमृतरूप कहलाता है, वही तप है । उसे ही शास्त्रीय सिद्धान्तमें मोक्ष कहते हैं । मन- की जो चञ्चलता है, वह अक्रिया है, वासना उसका स्वरूप है । शत्रुरूपिणी उस वासनाको विचारके द्वारा नष्ट करना चाहिये ॥ ८८-१०२ ॥ 'निष्पाप मुनि ! पुरुषार्थके द्वारा जिस लक्ष्यम मनको लगाओ, उसे प्राप्तकर अर्थात् सविकल्प समाधिमें स्थित हो निर्विकल्प समाधिको प्राप्त करो । अतएव प्रयत्नपूर्वक चित्तको चित्त- के द्वारा वशमें करके, शोकहीन अवस्थाके आश्रयसे आतङ्क- से मुक्त होकर शान्ति लाभ करे । मनका पूर्ण निरोध करनेमें विषयविहीन मन ही समर्थ होता है । राजाको पराजित करनेके कार्यमें राज्यविहीन राजा ही समर्थ होता है । जिन्हें तृष्णारूपी ग्राहने पकड़ रक्खा है, जो संसार-समुद्रमें गिरे हुए हैं, भँवरोंके जालमें पड़कर लक्ष्यसे दूर भटक रहे हैं, उनको बचानेके लिये अपना विषयविहीन मन ही नौकारूप है । ऐसे मनके द्वारा इस भारी बन्धनरूप मनके जालको काट डालो, और स्वयं संसारसागरके पार हो जाओ; दूसरेके द्वारा यह समुद्र पार नहीं किया जाता । अन्त करणको वासित (आच्छादित) करनेवाली मन-नामकी वासना जब-जब उदित हो, तब तब प्राज्ञ (बुद्धिमान्) पुरुष उसका त्याग करे । इससे अविद्याका नाश होता है । एक भोगवासनाका पहले त्याग करो, उसके बाद भेद-वासनाका त्याग करो, उसके बाद भावाभाव दोनोंका त्याग करके विकल्पहीन होकर सुखी हो जाओ । इस मनका नाश ही अविद्यानाश कहलाता है । मनके द्वारा जो कुछ भी अनुभवमें आता हो, उस-उसमें आस्था न होने दो । आस्थाका त्याग कर देना ही निर्वाण है, और आस्थाको पकड़े रहना ही दुःख है । जो प्रज्ञाविहीन हैं, उन्हींमें अविद्या विद्यमान रहती