कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६१६ * महोपनिषद् * [ अध्याय ५ थका सा विश्रामको प्राप्त हुआ । चिन्मात्रके अतिरिक्त और कुछ है नहीं, इस प्रकार समझो । इस समस्त जागतिक लीलासे विरत होकर तथा असन्दिग्ध भावसे चिन्मात्रको देखो ॥ ४८-५९ ॥ 'जिन्होंने सङ्कल्प-जालको निरस्त कर दिया है, जो चित्तत्व- हीन परम पदको प्राप्त है, वे ही समस्त दोषोंसे निवृत्त हो ब्रह्म- को प्राप्त करते हैं, जो विमनस्कताको प्राप्त हो चुके हैं, वे शान्त चित्तवाले महाबुद्धिमान् हैं। वेदान्तविचारशील प्राणी, जिनके चित्तकी वृत्तियाँ क्षीण हो गयी हैं, मनश्चिन्तनके त्यागका अभ्यास करते-करते जिनका मन कुछ परिपक्व हो गया है, जो मोक्षका उपाय खोजनेवाले पुरुष हेय तथा उपादेय- दोनों प्रकारके दृश्योंका त्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मतत्त्वके साक्षात्कारमे लगे हैं तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्चको नहीं देखते, जो विशेषरूपसे ज्ञातव्य परम तत्त्वमें जागरूक होकर जीवन धारण कर रहे हैं, जो रसमय तथा रस- हीन पदार्थोंमें अत्यन्त परिपक्व वैराग्यके कारण घने मोहसे युक्त संसार-पथमें सोये हुए हैं, वैराग्यकी तीव्रताके कारण पक्षीके जालके समान जिनका संसार-वासनाका जाल टूट गया है तथा हृदयकी ग्रन्थि शिथिल हो गयी है, ऐसे साधकोंका स्वभाव विज्ञानके द्वारा उसी प्रकार सशुद्ध हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फलके द्वारा जल स्वच्छ हो जाता है। मन जब रागादिहीन, अनासक्त, द्वन्द्वातीत तथा निरालम्ब हो जाता है, तब वह पिंजड़ेसे छूटे हुए पक्षीके समान मोहजालसे बाहर निकल जाता है । सन्देहरूप दुरात्मापन जिनका शान्त हो गया है, जो प्रपञ्चात्मक कुतूहलसे विरत हैं, उनका चित्त सब प्रकारसे पूर्ण होकर पूर्णचन्द्रके समान सुशोभित होता है ॥ ६०-६८ ॥ 'न मैं हूँ और न यहाँ दूसरा कुछ है, मैं सब दोषोंसे रहित ब्रह्मस्वरूप हूँ- जो इस प्रकार सत् और असत्के मध्यसे देखता है, वही वस्तुतः देखता है । जिस प्रकार सहज ही प्राप्त हुए दर्शन, द्रष्टा तथा दृश्योंमें मन बिना रागके ही जाता है, उसी प्रकार धीर बुद्धिवाले कर्तव्य कर्मोंमें बिना आसक्तिके ही लगे रहते हैं। भलीभाँति जानकर भोगा गया भोग उसी प्रकार तुष्टिका कारण बनता है, जिस प्रकार जानकर सेवा किया गया चोर चोरी छोड़कर मैत्रीका ही निर्वाह करता है। जिसकी मनमें शङ्का भी नहीं है, ऐसे गाँवके मार्गमे आ जानेपर पथिक जिस दृष्टिसे उसे देखता है, उसी दृष्टिसे ज्ञानी पुरुष भोगके ऐश्वर्योको देखते है। निग्रह किया हुआ मन अनायास प्राप्त हुए थोड़े-से भी भोगको, जो विस्तार- को नहीं प्राप्त हुआ है, क्लेशदायक होनेके कारण, बहुत अधिक समझता है । बन्धनसे मुक्त हुआ राजा भोजनके एक ग्रासमात्रसे सन्तुष्ट हो जाता है, परन्तु वह यदि शत्रुके द्वारा आबद्ध न हो तथा आक्रान्त न हो तो राष्ट्र भी उसके लिये उपेक्षणीय हो जाता है। हाथसे हाथको समर्दितकर, दाँत से दाँत पीसकर तथा अङ्गोंसे अङ्गोंको दबाकर, अर्थात् अपने सम्पूर्ण पराक्रम और उत्साहसे, पहले मनपर विजय प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । इस संसार-समुद्रमे मनपर विजय करनेके अतिरिक्त कोई दूसरी गति नहीं है । इस महानरकके साम्राज्यमे दुष्कृतरूपी मतवाले हाथी घूम रहे हैं। आशारूपी बाणो और बरछोंसे सजे- धजे इन्द्रियरूपी शत्रुओका जीतना दुष्कर है। जिन्होंने चित्तके दर्पको नष्ट कर दिया है तथा इन्द्रियरूपी शत्रुओको वशमें कर लिया है, उनकी भोग वासना उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे हेमन्त ऋतुमें कमलका पौधा नष्ट हो जाता है। रात्रिमें बेतालके समान हृदयमें वासनाका तभीतक निवास है, जबतक एकाग्रताके अभ्यासद्वारा मनको जीत नहीं लिया जाता। विवेकी पुरुषका मन अभीष्ट कार्य करनेके कारण भृत्यके समान है, सारे प्रयोजनोंको सिद्ध करनेके कारण मन्त्रीरूप है और मेरे विचारसे समस्त इन्द्रियोको वशमे करनेके कारण सामन्तरूप है। मेरे विचारसे मनीषी पुरुषका मन लालन करनेके कारण स्नेहशील ललनास्वरूप है तथा पालन करनेके कारण पालन करनेवाला पिता है। मनरूपी पिता शास्त्रदृष्टिसे तथा आत्मप्रकाश, आत्मबुद्धि एव आत्मानुभवके द्वारा परम सिद्धिको प्रदान करता है । अत्यन्त हृष्ट, अत्यन्त दृढ, स्वच्छ, भलीभाँति वशमें किया हुआ, भलीभाँति जाग्रत्, आत्मगुणोंसे तेजस्वी बनाया हुआ मनोरम मनरूपी मणि हृदयमें सुशोभित होता है । ब्रह्मन् ! भाँति-भाँतिके पङ्कोंसे मलिन इस मनरूपी मणिको सिद्धिके लिये विवेकरूपी जलसे धोकर आलोकवान् बनो । श्रेष्ठ विवेकका आश्रय लेकर बुद्धिसे सत्यका साक्षात् (निश्चय) करके, इन्द्रियरूपी शत्रुओंको पूर्णतः छिन्नकर संसार-सागर- से पार हो जाओ ॥ ६९-८४ ॥ 'केवल आस्थाको-संसारकी आशाको ही अनन्त दुःखोंका कारण जानो, और सर्वत्र केवल अनास्थाको सुखका घर समझो । वासनाके सूत्रसे बँधा हुआ यह संसार बारबार होता है। वह प्रसिद्ध वासना अत्यन्त दुःखका कारण बनती है और मनका