भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 832 में से

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पृष्ठ 665

५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१७


उन्मूलन करनेके लिये आती है। जीव चाहे धीर हो, अत्यन्त बहुश्रुत हो, कुलीन हो, महान् हो, फिर भी वह तृष्णासे उसी प्रकार बँध जाता है, जैसे शृङ्खलासे सिंह बँध जाता है। परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर और भलीभाँति उद्यम करते हुए शास्त्रानुसार शान्तिपूर्वक आचरण करता हुआ कौन पुरुष सिद्धिको नहीं प्राप्त करता । 'मैं ही अखिल विश्वरूप हूँ, मैं अच्युत परमात्मस्वरूप हूँ, मेरे सिवा और कुछ नहीं है'—इस प्रकारके ज्ञानद्वारा होनेवाला अहम्भाव ही श्रेष्ठ है। 'मैं समस्त प्रपञ्चसे अतीत हूँ, बालके अग्रभागसे भी सूक्ष्म हूँ'—ब्रह्मन् ! इस प्रकारके ज्ञानसे जो अहङ्कार होता है, वह दूसरा शुभप्रद अहम्भाव है और वह मोक्षका कारण बनता है, बन्धनका नहीं । ऐसा अहम्भाव जीवन्मुक्त पुरुषोंको ही होता है । 'हाथ-पैर आदिसे युक्त यह शरीरमात्र मैं हूँ'—इस प्रकारका निश्चय तीसरा लौकिक अहङ्कार है और यह अत्यन्त तुच्छ है । यह अहङ्कारात्मक दुरात्मा जीव ही संसाररूपी दुःखद वृक्षका मूल है। इससे मारा गया प्राणी अधःपतनकी ओर ही दौड़ता है । इस दुःखद अहङ्कारको त्यागकर और चिरकालतक शुभ अहङ्कारकी भावनामें लगा हुआ प्राणी शमयुक्त होकर मुक्तिको प्राप्त होता है। पहले कहे गये दो अलौकिक अहङ्कारोंको अङ्गीकार करके तीसरे दुःखद लौकिक अहङ्कारको त्याग देना चाहिये । पश्चात् उनको भी छोड़कर जो सब प्रकारके अहङ्कारोंसे रहित होकर स्थित है, वही उच्च पदको प्राप्त होता है ॥ ८५-९६ ॥

'भोगकी इच्छामात्र ही बन्धन है और उसका त्याग ही मोक्ष कहलाता है । मनकी उन्नति उसके विनाशमे है। मनोनाश महाभाग्यवान्‌का लक्षण है। ज्ञानी पुरुषके मनका नाश हो जाता है । अज्ञानीके लिये मन बन्धनरूप है । ज्ञानीका मन न आनन्दरूप है न आनन्दरहित है, न चल है, न अचल और न स्थिर ही है; वह न सद्रूप है, न असद्रूप ही और न इनके बीचकी ही स्थितिमें रहता है। जैसे चित्‌से प्रकाशित होनेवाला आकाश सूक्ष्मताके कारण दिखलायी नहीं देता, उसी प्रकार अखण्ड चेतनसत्ता सर्वव्यापी होते हुए भी दृष्टिगोचर नहीं होती । सारे सङ्कल्पोंसे रहित, सारी सजातोंसे शून्य यह चिदात्मा अविनाशी तथा स्वात्मा आदि नामोंसे व्यक्त किया जाता है । जो ज्ञानियोंकी दृष्टिमें आकाशसे भी सौगुनी स्वच्छ, निर्मल तथा निष्कल-रूप (अवयवरहित) है, एव जो सकल एव निर्मल संसारके रूपमे एकमात्र अपना ही दर्शन कराती है—इस प्रकारकी चित्, चेतनसत्ता न अस्त होती है न उदय होती है, न उठती है न स्थिर रहती है, न जाती है न आती है; न यहाँ है और न यहाँ नहीं है। वह चित् अर्थात् चेतनसत्ता विकल्परहित, निरालम्ब और निर्मल स्वरूपवाली है। गुरुको चाहिये कि प्रारम्भमें शम-दम आदि गुणोंके द्वारा शिष्यके अन्तःकरणको शुद्ध करे । पश्चात् 'यह सब कुछ ब्रह्मरूप है और तुम शुद्ध ब्रह्मस्वरूप हो' ऐसा बोध प्रदान करे । अज्ञानी पुरुषको तथा जो अर्द्ध-जाग्रत् है, उसे जो कहता है कि 'सब ब्रह्म ही है', वह उसे महानरकजालमें ढकेल देता है । जिसकी बुद्धि जाग्रत् हो गयी है, भोगकी इच्छा नष्ट हो गयी है, तथा जो सर्वथा आकाङ्क्षारहित हो गया है—ऐसे पुरुषको प्राज्ञ गुरु वेदान्तका यह उपदेश दे कि अविद्यारूप मल है ही नहीं । जिस प्रकार दीपकके होनेपर ही प्रकाश होता है, सूर्यनारायणके होनेपर ही दिन होता है, पुष्पके होनेपर ही सुगन्ध होती है, उसी प्रकार चित्-चेतनके ऊपर ही जगत्‌की स्थिति है । यह जगत् वास्तवमे है नहीं, केवल भासता है । जब तुम्हारी ज्ञान-दृष्टि निर्मल—आवरणशून्य हो जायगी, ज्ञानका सब ओर प्रकाश हो जायगा तथा तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओगे, तभी तुम मेरे उपदेशके बलाबलको ठीक ठीक जान सकोगे ॥ ९७-१०७ ॥

'स्वार्थनाशके लिये उद्यम करना ही जिसका एकमात्र प्रयोजन है, ऐसी श्रेष्ठ अविद्याके द्वारा ही, ब्रह्मन् ! सब दोषोंको हर लेनेवाली विद्याकी प्राप्ति होती है। अस्त्रके द्वारा अस्त्रका शमन होता है तथा मलके द्वारा मल धोया जाता है, विषके द्वारा विषका शमन होता है, शत्रुके द्वारा शत्रु मारा जाता है । इसी प्रकारकी यह भूतमाया है, जो अपने नाशसे ही हर्ष प्रदान करती है । इसका स्वरूप दिखलायी नहीं देता, दिखलायी देते ही यह नष्ट हो जाती है। परमार्थतः यह माया है ही नहीं—इस प्रकारकी दृढ भावनाके साथ 'सब ब्रह्म ही है'—ऐसी जो अन्तर्भावना होती है, वही मुक्ति प्रदान करती है । यह भेददृष्टि ही अविद्या है। इसका सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥ १०८-११३ ॥

मुने ! (मायाके द्वारा) जो नही प्राप्त होता है, वह अक्षयपद कहलाता है । द्विज ! यह माया किससे उत्पन्न हुई—यह तुम्हें नहीं विचारना है । 'मैं इसे किस प्रकार नष्ट करूँ'—यही तुम्हें विचार करना है । इसके क्षीण होकर नष्ट हो जानेपर तुम उस अक्षयपदको जान सकोगे । जहाँसे यह प्रकट होती है, जैसा इसका स्वरूप है, जिस प्रकार यह नष्ट होगी—अर्थात् निदान, लक्षण और शमनके