कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
तमिल-साहित्य ३००० वर्ष पुराना माना जाता है। ईसा-पूर्व चौथी शती तक उसमें काव्य, नाटक तथा गीति-साहित्य का विस्तृत प्रणयन हो चुका था। इस भाषा का सर्वप्रथम व्याकरण, जो 'तोलकाप्पियम्' के नाम से प्रसिद्ध है, ईस्वी-सन् पूर्व तीसरी शती में लिखा गया था। यह एक बृहदाकार लक्षण-ग्रन्थ है और अब उपलब्ध तमिल-ग्रन्थों में सबसे प्राचीन है। इस ग्रन्थ में तमिल-भाषा के व्याकरण के अतिरिक्त काव्य-पद्धतियों, छन्द, अलंकार एवं काव्य में वर्ण्य विषय-वस्तु (जिसे तमिल में 'पोरुल्' कहते हैं) का विशद विवेचन है। तमिल-व्याकरण में 'पोरुल्' के दो विभाग किये गये हैं—'अहम्' और 'पुरम्'। अहम् में शृंगार-रस का पोषण होता है, और 'पुरम्' में शृंगारेतर रसों का पोषण होता है, विशेष कर वीर रस का। अहम् और पुरम् मनुष्य के जीवन के अन्तरंग एवं बहिरंग पक्ष के प्रतिपादक हैं। यह विभाजन तमिल-काव्यशास्त्र की विलक्षणता है, जो अन्य किसी भाषा के साहित्य में प्राप्त नहीं होता।
तमिल-साहित्य का आदिकाल 'संघम् काल' के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि साहित्य की अभिवृद्धि के लिए मदुरा के पांड्य राजाओं ने, एक के पश्चात् एक, तीन 'संघम्' स्थापित किये थे। अपने समय के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् एवं कवि इस संघम् के सदस्य होते थे। संघम् का कार्य कवियों की रचनाओं की समीक्षा करके उनपर प्रामाणिकता एवं श्रेष्ठता की मुहर लगाना होता था। संघम् द्वारा स्वीकृत रचनाओं को ही लोक में प्रतिष्ठा मिलती थी। यह विश्वास प्रचलित है कि इन तीनो संघमों में कुल ६५७ कवि-सदस्य बने थे और हजारों वर्ष तक इन संघमों ने कार्य किया था। इस काल के कुछ कवियों की रचनाएँ पृथक्-पृथक् पुस्तकों में संगृहीत हैं।
ईस्वी-सन् पूर्व तीसरी शती से ईसा की छठी शताब्दी तक तमिल-देश में जैन तथा बौद्ध धर्मों का विस्तार रहा। जैन तथा बौद्ध कवियों ने अनेक सुन्दर ग्रन्थ लिखे और उनके द्वारा अपने धर्म का प्रचार तथा तमिल-भाषा की सेवा की। ईसा की दूसरी और तीसरी शताब्दियों में तमिल में पाँच महाकाव्य रचे गये, जिनके नाम हैं—१ शिलप्पधिकारम्, २ मणिमेखलै, ३ जीवकचिन्तामणि, ४ वलयापति तथा ५ कुंडलकेशी। इनमें से प्रथम दो बौद्ध कवियों की रचनाएँ हैं और तमिल की विशिष्ट कला के परिचायक हैं। 'जीवकचिन्तामणि' किसी जैनकवि की रचना है। इसका छंद संस्कृत के वर्णवृत्तों पर आधृत है और अलंकार भी संस्कृत-साहित्यशास्त्र के अनुकूल बने हैं। अपने काव्य-सौन्दर्य के कारण यह ग्रन्थ अपने समय में बहुत लोकप्रिय बना था। 'कुंडलकेशी' और 'वलयापति'—ये दोनों काव्य अब अनुपलब्ध हैं।
ईसा की छठी शती से तमिल-देश में भक्ति का आन्दोलन जोर पकड़ने लगा और बौद्ध तथा जैनधर्मों का प्रभाव कम होने लगा। छठी तथा तेरहवीं शतियों के मध्य तमिलनाड में अनेक वैष्णव तथा शैव संत उत्पन्न हुए, जिन्होंने अत्यन्त सुन्दर काव्य-रचना