कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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के साथ-साथ विष्णु तथा शिव-भक्ति की पीयूष-धारा बहाई, जिसने दक्षिण भारत-मात्र को ही नहीं, वरन् सारे भारतवर्ष को प्रभावित किया और हिन्दू-जनता को मुक्ति का एक नवीन मार्ग दिखलाया । पीछे चलकर इन धाराओं ने हिन्दी-जगत् एव हिन्दी-साहित्य को भी आप्लावित कर दिया ।
वैष्णवधर्म के अनुयायी बारह सत हुए, जिन्हें 'आलवार' कहते हैं । आलवार शब्द, का अर्थ होता है 'ज्ञानी' । उन्होने भगवान् विष्णु को परम तत्त्व मानकर उनकी उपासना की और उनकी प्रशंसा मे सहस्रो सुन्दर तथा मधुर गीत गाये । इन गीतों की संख्या चार हजार है, जो तमिल में 'नालायिरप्रबन्धम्' या 'दिव्यप्रबन्धम्' के नाम से प्रसिद्ध हैं । श्रीमद्रामानुजाचार्य इन्हीं आलवारो द्वारा प्रतिपादित वैष्णव धर्म के अनुयायी थे ।
जिस समय वैष्णव संत भगवान् विष्णु को अपना आराध्य देव मानकर उनकी भक्ति का प्रचार कर रहे थे, प्रायः उसी समय शैव सत भगवान् शिव के गुणानुवाद मे अपनी अमृतमय वाणी को सफल बना रहे थे । इस मत में ६३ सत हुए, जिन्हें 'नायनमार' कहते हैं । इन्होने भगवान् शिव की प्रशंसा में हजारो ललित एवं गेय पद रचे, जो आज भी शिवभक्तो की अमूल्य निधि हैं । इनके द्वारा विरचित विपुल साहित्य बारह खंडो में विभाजित है ।
कंबन का स्थान तमिल-साहित्य मे अत्यन्त श्रेष्ठ है और वे कविचक्रवर्त्ती के नाम से प्रसिद्ध हैं । उनकी रचना 'रामायण', जो 'कंब रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है, १० हजार से अधिक पद्यों का एक विशाल ग्रन्थ है ।
कंबन का समय निश्चित नहीं है । कुछ विद्वान् उन्हे ईसवी नवी शताब्दी का मानते हैं, किन्तु अधिक प्रामाणिक समय बारहवी शताब्दी है ।$^१$ इस समय तक बारह आलवार हो चुके थे और यामुन, रामानुज आदि आचार्यों की परम्परा भी चल पड़ी थी । इन आचार्यों ने भक्ति एव प्रपत्ति का शास्त्रीय विवेचन किया । कंबन वैष्णव थे, प्रमुख आलवार 'नम्मालवार' की उन्होंने प्रस्तुति की है और उनके काव्य में यत्र-तत्र इन आलवार की श्रीसूक्तियो की छाया दृष्टिगत होती है, तो भी कंबन ने अपने काव्य को केवल साम्प्रदायिक नहीं बनाया है । प्रो० टी० पी० मीनाक्षिसुन्दरम् के अनुसार कंब रामायण केवल वैष्णव सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है । ग्रन्थालम्भ मे तथा प्रत्येक काड के आदि में मंगलाचरण के जो पद्य हैं, उनसे यह तथ्य प्रकट होता है । कवि ने परमात्मा का वर्णन शिव और विष्णु के रूप से भी अतीत, केवल सृष्टिकर्त्ता के रूप मे किया है । किन्तु, रामचन्द्र को उस परमात्मा का अवतार ही माना है ।
इसका परिणाम यह हुआ कि शैवों और वैष्णवो के मध्य 'कंब रामायण' का आदर हुआ और इन दोनों सम्प्रदायो मे जो वैमनस्य था, उसके दूर होने मे सहायता मिली ।
कंबन का जन्मवृत्त कुछ निश्चित ज्ञात नहीं हुआ है । उनके संबंध मे अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं, जिनकी प्रामाणिकता संदेहास्पद है । कवि ने कही भी अपना
१. प्रो० टी० पी० मीनाक्षिसुन्दरम्—(तमिल-विभागाध्यक्ष, अन्नामलै-विश्वविद्यालय) इसी को प्रामाणिक मानते हैं ।—अनु०