कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)
Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary
कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 354 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधिक अर्थसंगत हो सकता है; परंतु इसके विषयमें जब तक अन्यान्य विद्वान् साधक-बाधक भाव वाले विशेष विचार उपस्थित नहीं करते और उन पर उचित ऊहापोह नहीं किया जाता, तब तक इस बारेमें कोई सिद्धान्त स्थिर नहीं किया जा सकता। हमें यहां पर यह विचार इस लिये प्रदर्शित करना आवश्यक हुआ कि - प्रस्तुत कान्हड दे प्रबन्ध, आज तक गुजराती भाषाकी एक सर्वमान्य एवं सर्वज्ञात, प्राचीन कृति मानी जा रही है और गुजराती भाषाके इतिहासमें इसको एक विशिष्ट स्थान दिया जाता है - तब हम यहां पर इसे एक 'राजस्थानी महाकाव्य' किस अभिप्रायसे कह रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि प्रस्तुत काव्यके जैसी भाषारचनायें, जिस समयके अंतर्गत निर्मित हुईं, उस समयमें रा ज स्था नी या गु ज रा ती ऐसा भाषा-भेदसूचक कोई नामनिर्धारण नहीं हुआ था। राजस्थानी और गुजराती ये नाम मुगलोंके शासन कालके परिणामसे उत्पन्न हुये हैं। परंतु अब इस नूतन युगकी साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक आदि सर्व प्रकारकी नूतन परिस्थितियोंके परिणामस्वरूप, राजस्थानी एवं गुजराती इस प्रकारकी भाषा- भेदसूचक और कुछ अंशोंमें संस्कृति-भेद सूचक भी शाब्दिक प्रसिद्धि रूढ हो गई है और उसके फलस्वरूप, आधुनिक गुजरात एवं राजस्थानके नामसे प्रसिद्ध और प्रस्थापित होने वाले प्रदेशोंके निवासियोंके मनमें, संस्कृति, साहित्य और भाषाके इतिहासका अवलोकन और अन्वेषण करनेका दृष्टिकोण भी कितनेक अंशोंमें, भिन्नभावके रूपमें विकसित हो रहा है। पर यह तो परिवर्तित समयकी परिस्थितिका अनिवार्य परिणाम है। इससे हमें व्यग्र या व्यथित होनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। हमें इसमें समंजसताका सूत्र शोधना चाहिये और उसे पकडना चाहिये। भ्रान्तिजनक एवं भेदवर्धक भावोंका निराकरण करना चाहिये। मैं यहां पर प्रस्तुत प्रबन्धको राजस्थानीका काव्य कहना पसन्द करता हूं तो उसका कारण भाषावैज्ञानिकोंने इसमें प्रयुक्त भाषाका वैसा जो शास्त्रीय नाम निश्चित किया है, वह है। हमारे गुजराती साहित्यके इतिहासमें, इसको गुजराती काव्य कहा गया है तो उसका कारण यह है कि जिस समय यह काव्य रचा गया, उस समय, आधुनिक राजस्थान और गुजरातके प्रदेशोंमें भाषा- विषयक कोई खास भिन्नता थी ही नहीं। थोडी-बहुत भिन्नता जो थी, वह केवल राजकीय सीमाओंके संबंधकी दृष्टिसे थी। बाकी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक दृष्टिसे इन दोनों प्रदेशोंके बीचमें कोई सीमाभेद नहीं था। ये परस्पर एकरूप थे। चालुक्योंकी राजधानी अणहिल- पुरमें बसने वाले लोक जैसी भाषा बोलते थे, प्रायः वैसी ही भाषा, चाहमानोंकी राजधानी अजमेरमें रहने वाले लोक बोलते थे। चाहे उनके स्थानिक उच्चार और वाग्व्यवहारमें कुछ थोडी-बहुत भिन्नता भले ही रहती हो परंतु उनकी साहित्यिक भाषा एवं लिखित भाषा एकसी ही थी। अतः इस ऐतिहासिक तथ्यको लक्ष्य कर, हम इसे गुजराती महाकाव्य भी उतने ही अंशमें कह सकते हैं जितने अंशमें इसे राजस्थानी कहना चाहते हैं। बाकी कवि तो स्वयं इसको केवल 'प्रा कृत ब न्ध' कहता है, जो उस युगमें प्रान्तीय देशभाषाओंके कवियोंमें एक सामान्य रूढि चली आ रही थी। संस्कृतभिन्न