कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)
Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary
कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रास्ताविक वक्तव्य ५ देशभाषाओंको, विद्वान् जन या तो सामान्य रूपसे प्राकृत कह कर उल्लिखित करते थे, या फिर काव्यशास्त्रके विवेचकोंने विशेषतया जिसका नाम अपभ्रंश रखा था, लोकभाषाका उसी अपभ्रंश नामसे व्यवहार करते थे । भाषाके कवियोंने तो नहीं लेकिन व्याकरणके विद्वानोंने, इन लोक- भाषाओंको लक्ष्य कर, प्राचीन प्राकृत और तद्भव अपभ्रंश भाषाभेदोंके, जो कुछ नाम निर्दिष्ट किये हैं उनमें एक गौ र्ज र अ प भ्रं श नाम भी मिलता है । इस दृष्टिसे हम इस प्रबन्धकी भाषाको 'गौर्जर अपभ्रंश' भी कहें तो उसमें कोई असंगति नहीं प्रतीत होती । शायद इसी विचारको लक्ष्यमें रख कर, गुजराती भाषाके समर्थ विद्वान् एवं प्रौढ भाषाशास्त्रज्ञ स्व० नरसिंहराव भो० दिवेटियाने प्रस्तुत प्रबन्धकी भाषाको 'प्राचीन गुजराती' भाषा न कह कर 'गूर्जर अपभ्रंश' कहना उचित समझा होगा । इस प्रकार प्रस्तुत प्रबन्धको प्राचीन राजस्थानी, अथवा प्राचीन गुजराती, अथवा तो गूर्जर अपभ्रंश, चाहे जिस भाषाकी रचना कही जाय या मानी जाय । इसमें वाद-विवादका कोई कारण हमें नहीं लगता । वास्तवमें यह रचना समूचे पश्चिम भारतकी 'नूतन-भारत-आर्य -भाषा' कुल की एक प्रतिनिधिरूप और प्रमाणभूत उत्तम साहित्यिक कृति है । अतः इस दृष्टिसे इसका अध्ययन, अवलोकन और अनुशीलन होना आवश्यक है; और इसी विशुद्ध वैज्ञानिक विचारको लक्ष्यमें रख कर, हमने इसे राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला द्वारा प्रकट करना उचित समझा है । ❊ इस प्रबन्धमें, कुछ तो राजस्थान-गुजरातके गौरवमय सुवर्णयुगकी समाप्तिका वह करुण इतिहास अंकित है जिसे पढ कर हम खिन्न होते हैं, उद्विग्न होते हैं और रुदन करते हैं; पर साथ ही में इसमें, उस कराल कलियुगमें भी देवांशी अवतार लेनेवाले ऐसे धीरोदात्त वीर पुरुषोंका आदर्श जीवन चित्रित है जिसे पढ कर हमें रोमांच होता है, गर्व होता है और हर्षाश्रु आते हैं । जिस समयकी घटना का इस काव्यमें वर्णन है वह समय भारतके लिये बडा भयंकर प्रलय- काल-सा था । भारतकी प्राचीन संस्कृति और समृद्धिका सर्वनाश करने वाला वह असाधारण विकराल काल था । उस कालदैत्यके कोपानलसे शताब्दियोंसे संचित और सर्जित भारतकी उस संसार- मोहिनी संस्कृति, समृद्धि, सार्वभौमता और सुरक्षितताका बहुत बडा भाग, कुछ ही क्षणोंमें भस्मीभूत-सा हो गया । पूर्वदेशका पाल-साम्राज्य, मध्यदेशका गाहडवाल साम्राज्य, दिल्ली-लाहोरका तोमर-राज्य, अजमेर-सपादलक्षका चाहमान-राज्य, अणहिलपुरका चालुक्य महाराज्य, अवन्ती- मालवका प्रमार साम्राज्य, एवं दक्षिण-देवगिरिका यादव राज्य-इस प्रकार भारतके पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण जैसे चारों खण्डोंमें, कई शताब्दियोंसे अपनी बलवान् सत्ता जमाये हुये बडे बडे राज्य और उनके शासक राजवंश, इस दुष्ट दावानलकी दुर्देवी ज्वालाओंसे कुछ ही दिनोंके अन्दर, देखते देखते, दग्ध हो गये । अपार समृद्धिसे भरे हुए उनके असंख्य राज्यभण्डार घडियोमें लुट गये । हजारों वर्षोंसे खडे हुए गगनचुंबी और पातालकंपी महान् राजप्रासाद एवं देवमन्दिर थोडी ही पलोंमें शतखण्ड हो हो कर धराशायी हो गये ।