कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)
Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary
कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ कान्हड दे प्रबन्ध उक्त प्रत्येक देशमेंसे लाखों नर-नारी धर्मभ्रष्ट, गृहविहीन और बन्दी बन गये और लाखों ही अपने प्राणों तकसे मुक्त हो गये । यद्यपि इस कराल कालके सर्जक और प्रतिनिधि स्वरूप उन यमदूतसे आक्रान्ताओंके अनेक इतिहासकारोंने इस प्रलयके विषयकी सत्य-असत्य ऐसी असंख्य घटनायें आलेखित की हैं-परन्तु जिस देश पर, जिस जनता पर, जिस जाति पर, इस प्रकार, उस दुष्ट दानवने अपना दैत्यास्त्र चलाया, उसकी अनन्त सन्तानोंमेंसे शायद ही दो-चार व्यक्तियोंने, ऐसी दो-चार छोटी-बड़ी कृतियोंमें, उक्त कालकथाका कुछ आभास आलेखित किया है । इन्हीं दो-चार व्यक्तियोंमें से, प्रस्तुत प्रबन्धकर्ता कवि पद्मनाभ भी एक है और इसका स्थान उन सबमें प्रथम नहीं तो प्रधान तो अवश्य है । इस देशप्रेमी, जनताप्रेमी, जातिप्रेमी कविने, उक्त कालकथाका जितना संगत, जितना संयत, जितना समुचित वर्णन किया है वैसा शायद अन्य किसी कविने, अन्य किसी कृतिमें नहीं किया । साक्षात् प्रलयसदृश उस क्रूर महाकालके साथ, राजस्थानके एक छोटेसे सुवर्णगिरि दुर्गपर रहनेवाले स्वल्पसंख्यक महावीरोंने और वीरांगनाओंने, कैसा भयंकर अट्टहास किया, उस दुर्धर दानवका कैसा मार्मान्तिक उपहास किया और उसके दुष्ट मनोरथोंको कैसे चूरचूर किया, इसका वास्तविक चित्र कवि पद्मनाभने इस काव्यमें बडी हृदयंगमताके साथ आलेखित किया है । काव्यगत वस्तुका विस्तृत विवेचन यहां अपेक्षित नहीं है । वह तो इसके दूसरे भागमें दिया जायगा । प्रस्तुतमें तो केवल संक्षेपमें काव्यकी उपयोगिता और विशिष्टताका सूचक कुछ परिचय देना ही उद्दिष्ट है । * इस काव्यकी एक हस्तलिखित प्राचीन पोथी, सबसे पहिले, भारतीय संस्कृति, साहित्य और इतिहासके असाधारण प्रेमी एवं अन्वेषक, स्वर्गस्थ महान् जर्मन विद्वान् डॉ. ब्यूल्हरको राजस्थान एवं गुजरातमें प्राचीन ग्रंथोंकी खोज करते समय, सीरोही राज्यके निकट- स्थ एवं उत्तर गुजरातकी सीमा पर बसे हुए, थराद (प्राचीन 'थिरापद्र') नामक गांवके एक प्राचीन जैन ग्रन्थभंडारमें मिली । डॉ० ब्यूल्हरने तुरन्त उसकी उपयोगिता पहचान ली और गुजराती भाषाकी एक विशिष्ट प्राचीन कृति एवं गुजरात-राजस्थानके इतिहासका एक विशिष्ट प्रबन्ध समझ कर, इसको प्रकाशित करनेके लिये, तत्कालीन 'गुजरात शाळा पत्र' नामक मासिक पत्रके संपादक सुप्रसिद्ध गुजराती विद्वान् नवलराम लक्ष्मीराम पंड्याको भेज दी, जिसे उनने अपने मासिकके सन् १८७७-७८ के कई अंकोंमें, क्रमशः प्रकट किया । 'गुजरात शालापत्र' में प्रकाशित यह प्रबन्ध भाषा या पाठशुद्धिकी दृष्टिसे बहुत ही सामान्य कोटिका था । पीछेसे जब कुछ अन्य विद्वानोंने इस ग्रन्थका विशेष अवलोकन किया, तो इसकी कुछ चर्चा होने लगी और इसके अध्ययनकी ओर कुछ आकर्षण बढ़ने लगा । सन् १९१३ में गुजराती साहित्य एवं भाषाके अन्यतर विद्वान्, स्व० डाह्याभाई पी० देरासरीने इस प्रबन्धकी कुछ और हस्तलिखित प्राचीन प्रतियां प्राप्त कर, उनके आधारसे एक अच्छा संस्करण तैयार