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कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary

कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished354 पृष्ठ

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प्रास्ताविक वक्तव्य ७ करनेका प्रयत्न किया और पाठशुद्धिकी दृष्टिके साथ, प्रस्तावना, टिप्पण आदिसे सज्जित कर इसे प्रकट किया । यद्यपि श्रीयुत देरासरी द्वारा संपादित वह संस्करण सामान्यतया अच्छा था, परंतु पाठशुद्धि आदिकी दृष्टिसे जैसा चाहिये वैसा उपयुक्त नहीं था। पिछले कई वर्षोंसे बंबई युनिव- र्सिटीके गुजराती साहित्य विषयक पाठ्यक्रममें इस प्रबन्धका समावेश होता रहा है, अतः इसका पठन-पाठन बढा और विद्यार्थियोंको एवं अध्यापकोंको इसके एक उत्तम एवं शास्त्रीय पद्धतिके मुताबिक संपादित नूतन संस्करणकी आवश्यकता विशेष प्रतीत होने लगी । राजस्थान और गुजरातके कई स्थानोंके ग्रन्थभंडारोंमें इस प्रबन्धकी कुछ और प्राचीन प्रतियोंकी उपलब्धि हुई जिसे देख कर मेरे मनमें यह विचार हुआ कि इसका नूतन संस्करण कोई विद्वान् तैयार करे तो बहुत उपयोगी होगा । कोई सन् १९३९-४० में प्रो० कान्तिलाल व्यासके सम्मुख, प्रसंगवश वार्तालाप करते समय, मैंने अपना यह विचार प्रदर्शित किया; तो इनने बडे उत्साह और आनन्दके साथ, इस कार्यको हाथमें लेनेकी अपनी उत्कंठा प्रकट की और फिर, मैंने भी इसमें मुझसे हो सके वह सहायता करने-करानेका अपना मनोरथ प्रकट किया । उस समय मेरे मनमें था कि यदि अन्य कोई संस्था इसके प्रकाशनका प्रबन्ध न कर सकेगी तो मैं अपनी सिंघी जैन ग्रन्थ माला द्वारा ही इसे प्रकट करनेका प्रयत्न करूंगा । यद्यपि प्रो० व्यासने इसके संपादनका कार्य उसी समयसे प्रारंभ कर दिया था, लेकिन अन्यान्य भण्डारोंमें से प्राचीन प्रतियां प्राप्त करनेमें और उनके पाठान्तर आदि लेनेमें अपेक्षासे बहुत ही अधिक श्रम और समयसाध्य कार्य अनुभूत हुआ । लगभग ११-१२ वर्ष जितने दीर्घ समयमें इसका पाठसंकलन कार्य संपन्न हुआ । इस संकलनमें किस किस प्रकारकी प्राचीन पोथियोंका उपयोग किया गया है, उसका विस्तृत परिचय प्रो० व्यासने अपनी विस्तृत अंग्रेजी भूमिकामें दिया है । सन् १९५० में, राजस्थान सरकारने, राजस्थानकी साहित्यिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक साधन-सामग्रीका अन्वेषण, संग्रह, संरक्षण, संशोधन और प्रकाशन आदि करनेकी दृष्टिसे, परामर्शके लिये मुझे आमंत्रित किया। मेरे सुझाव और प्रस्तावके अनुसार, सरकारने राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर नामक कार्यालयकी स्थापना की और उसका प्रारंभिक संचालन कार्य सम्भालनेके लिये भी मुझे ही आदेश दिया । तदनुसार राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिरके जो कार्य चालू किये गये हैं, उनमें एक प्रधान अंगस्वरूप कार्य राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला का प्रकाशन है जिसके द्वारा, विशेष रूपसे, राजस्थानके साथ संबन्ध रखने वाले संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और राजस्थानी-गुजराती, हिन्दी आदि भाषाओंमें रचे गये ग्रन्थोंको, सुयोग्य विद्वानों द्वारा संशोधित-संपादित-अनुवादित आदि करा कर प्रकट करनेका है। प्रो० व्यास द्वारा सुसंपादित प्रस्तुत 'कान्हड दे प्रबन्ध' इस ग्रन्थमालाका एक बहुत उपयुक्त और बहुमूल्य मणि जैसा भूषण स्वरूप होगा, ऐसा सोच कर मैंने इसको, इस ग्रन्थमालामें गुम्फित करनेका अपना अभिप्राय