भारतकोश
कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary

कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished354 पृष्ठ

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८ कान्हड दे प्रबन्ध इनको सूचित किया; तो इनने इसका बडे आदरके साथ स्वीकार किया । इसके फलस्वरूप, प्रायः तीन वर्षके सतत परिश्रमके बाद, इसका मूलग्रन्थ स्वरूप यह प्रथम भाग, आज विद्वानोंके हाथोंमें उपस्थित किया जा रहा है । प्रो० कान्तिलाल व्यास मेरे बहुत ही निकटीभूत मित्रोंमेंसे हैं । इनकी साहित्योपासना बडी लगनवाली है । हाथमें लिये गये कामको ये बडी श्रद्धा और निष्ठा पूर्वक करनेका स्वभाव रखते हैं; और साथमें एक बहुत ही विनम्र शिष्यके रूपमें अपने आपको उपस्थित करते हैं । बंबई राज्यकी सर्वश्रेष्ठ सरकारी कॉलेजके, गुजराती भाषाविभागके, ये प्रधानाध्यापक हैं और प्राचीन गुजराती भाषा, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं अन्यान्य विविध संस्कृति विषयक अनेक विषयोंमें, मौलिक अनुशीलन और संशोधन स्वरूप विशिष्ट कोटिका काम करते रहते हैं । अपने अध्ययन-मननके परिणाम स्वरूप कई अच्छे निबन्ध और पुस्तक आदिका इनने प्रणयन किया है जिनका विद्वानोंने अच्छा सत्कार किया है एवं युनिवर्सिटी आदि प्रौढ प्रतिष्ठानोंने उनकी मूल्यवत्ताको उपलक्ष्य कर, इनको सुवर्णचन्द्रकादि जैसे पारितोषिकोंसे सत्कृत किया है । इनका संपादित 'वसन्त विलास' नामक प्राचीन गुजरातीका रसात्मक फागु काव्य विद्वानोंमें बहुत आदरपात्र बना है और कई युनिवर्सिटियोंने, अपने 'नूतन भारतीय भाषा विषयक' पाठ्यक्रममें उसे समाविष्ट किया है । इसी 'वसन्त विलास' की प्रस्तावना लिखते समय हमने इनके विषयमें आशा प्रदर्शित की थी कि-'प्रो० व्यास इस तरह अपना संशोधनकार्य सतत चालू रखेंगे और उसके द्वारा प्राप्त सुंदर फल, समशील विद्वानोंके सम्मुख उपस्थित कर, उनके अभिनन्दन प्राप्त करते रहेंगे ।' हमारी वह शुभाशा, आज प्रस्तुत ग्रन्थके, इस प्रकारके, उत्तम संपादन- रूपमें, अच्छी तरह फलवती हुई देख कर, मुझे और भी विशेष आनन्दका होना स्वाभाविक है और इस लिये मैं आज पुनः, ठीक ११ वर्ष बाद, उसी जयाभ्युदयकारिणी विजयादशमीके मांगलिक दिन (उक्त 'वसन्त विलास फागु' की प्रस्तावना भी मैंने वि. सं. १९९८ के विजयादशमीके दिन लिखी थी) इनको अपना हार्दिक अभिनन्दन देता हूं । विजयादशमी, वि. सं. २०१० } १७, अक्टूबर, १९५३ } मुनि जिनविजय