कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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मिलता। इसी प्रकार जो लोग सदा एकान्त में रहते हैं और कर्म नहीं करते, जहाँ संसार के साथ उनकी मुठभेड़ हुई, और पतित हुए। “धोबी का कुत्ता घर का न घाट का।”
इसी प्रकार जो रात दिन सांसारिक आन्दोलन में व्यस्त रहता है वह कदापि एकान्त-सेवन का अधिकारी नहीं। वह यथार्थ में विक्षिप्तालय (पागलख़ाने) भेजने योग्य है। सच्चा और सिद्धान्ती पुरुष वह है जो चुपचाप एकान्त-वास करता हुआ भी कर्म से कभी उपराम नहीं करता। एवं रात दिन सांसारिक आन्दोलन और क्रिया-कलाप में तत्पर रहता हुआ भी मनोनिग्रह और आत्म-संयम द्वारा यथार्थ में एकान्त सेवन करता है। क्योंकि जिसका मन एकान्त होगया है, स्थान की अनेकान्तता उसके उद्देश में बाधा नहीं डाल सकतीं। हाँ, जिसका मन ही अनेकान्त है, स्थान की एकान्तता उसे कुछ लाभ नहीं पहुँचा सकती। जिसने अपने मन को एकाग्र कर लिया, मानो जगत् को जीत लिया। वह जनसमूह में रहता हुआ भी, जहाँ लोगों के कलकल शब्द से कान बहरे होते हैं, शान्त-चित्त रहता है। उसका मन मानो किसी योगी की गुफा है, जहाँ कोई शब्द नहीं पहुँच सकता। वह इस दशा में भी कर्म से विमुख नहीं है। यह कर्मयोग का स्वरूप है। यदि तुमने इस आदर्श को प्राप्त कर लिया है तो तुम कर्म के रहस्य को समझ गये हो।
किन्तु हमको आरम्भ में भिन्न भिन्न कामों को हाथ में लेकर क्रमशः उन्नति करनी है। जैसे शनैः शनैः हम आगे बढ़ते चले जावेंगे, वैसे ही दिन प्रति दिन हम उदार और संयमी बनते चले जावेंगे। जिस कर्म को हमने कर्त्तव्य या अपनी दशा के अनुकूल