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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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१६ कर्मयोग

समझ कर स्वीकार किया है, दृढ़ता और परिश्रम के साथ विश्वास-पूर्वक हमें उसे करते रहना चाहिए। इस प्रकार नियमपूर्वक कर्म करने से एक वर्ष के भीतर ही हमारी दशा बहुत कुछ बदल जायगी। जो कुछ स्वार्थ के संस्कार हमारे मन में होंगे वे अभ्यास की अग्नि में जल जावेंगे और थोड़े ही दिनों के पश्चात् हम निष्काम कर्म के महत्व को समझ जावेंगे। कभी कभी यदि स्वार्थ-बुद्धि उत्पन्न भी होगी तो हम सहज में उसे दबा सकेंगे। यदि इसी प्रकार काम होता रहा तो जैसे बहते हुए नदी-नाले समुद्र में पहुँच जाते हैं, वैसे ही एक ऐसा समय हमारे जीवन में भी आ जायगा, जब कि हम बिलकुल शान्त और निष्काम हो जावेंगे। और, जब हममें, काम-वासना न रहेगी तो हमारे संपूर्ण संस्कार और शक्तियाँ बाहर क्षीण न होकर हमारे भीतर ही सञ्चित होने लगेंगी। तब आपही आप हमारे हृदय में ज्ञान का प्रकाश होगा और हम सत्य के दर्शन कर सकेंगे।