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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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दूसरा अध्याय

निष्काम कर्म का महत्त्व

दूसरों को शारीरिक सहायता देना और उनकी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करना बहुत अच्छा काम है। परन्तु वह सहायता, जो आवश्यकतानुसार दी जाती है, सर्वोपरि सिद्ध हुई है। उसका प्रभाव नित्य और दूरगामी है। वह व्यक्तियों को लाभ पहुँचाती हुई जातीय आवश्यकताओं को भी पूर्ण करती है। यदि एक घण्टे के लिए किसी मनुष्य की कोई आवश्यकता पूरी कर दी जाय तो यह सहायता अवश्य कहलावेगी। किन्तु यदि एक वर्ष के लिए उसकी आवश्यकता पूरी कर दी गई है, तो यह उसकी अपेक्षा अधिक सहायता मानी जावेगी। और, यदि, सदा के लिए (जीवन भर के लिए) उसकी आवश्यकता पूरी कर दी गई तो फिर इसका क्या कहना है। यह सबसे बड़ी और सबसे उत्तम सहायता है। आत्मिक ज्ञान ही एक ऐसी वस्तु है जिससे सदा के लिए हमारे दुःखों की समाप्ति हो जाती है। और प्रकार के ज्ञान से केवल थोड़ी देर के लिए हमारी तृप्ति हो जाती है। केवल अपने स्वरूप का ज्ञान ही हमें सदा के लिए दुःखों से मुक्ति दिलाता है। इसलिए आत्मिक सहायता सबसे बड़ी और प्रधान सहायता है। जो मनुष्य इस प्रकार की आत्मिक सहायता दे सकता है, वह