BharatKosha
कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

Page 24 of 115

Read in context
Page 24

१८ कर्मयोग

मनुष्य-समाज का सच्चा मित्र और सच्चा गुरु है। इतिहास हमें बतला रहा है कि जिन लोगों ने मनुष्य की आत्मिक आवश्यकताओं के पूरा करने का प्रबन्ध और यत्न किया है वे बड़े प्रभाव-शाली पुरुष हुए हैं, और उन्होंने संसार की काया पलट दी है। वास्तव में आत्मिकता ही हमारे जीवन के सारे कर्मों की कुञ्जी है। आत्मिक बल-युक्त पुरुष यदि चाहे तो अन्य विषयों में भी असाधारण सफलता प्राप्त कर सकता है। बिना आत्मिक बल के सांसारिक और शारीरिक आवश्यकतायें भी यथेष्ट पूर्ण नहीं हो सकतीं। आत्मिक सहायता के पश्चात् बुद्धि और मन की सहायता है। शिक्षा और ज्ञान की सहायता, भोजन और वस्त्र की सहायता से कहीं अधिक है। यह प्राण-रक्षा और जीवन-दान से भी अधिक आवश्यक है। क्योंकि मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश ही विद्या और ज्ञान की प्राप्ति करना है। अज्ञान मृत्यु है और ज्ञान ही जीवन है। यदि मनुष्य अज्ञान के कारण अँधेरे में भटकता और टटोलता फिरता है तो उसका जीवन व्यर्थ ही नहीं किन्तु दुःखदायक है। इसके बाद फिर शारीरिक सहायता का नम्बर आता है। इसलिए दूसरों की सहायता करते समय हमको कभी इस भूल में न पड़ना चाहिए कि केवल शारीरिक सहायता ही सब कुछ है। शारीरिक सहायता सबसे पिछली है, क्योंकि इससे स्थिर सुख नहीं मिलता। भूख का दुःख खाना खा लेने से शान्त हो जाता है, पर थोड़ी देर बाद फिर हमें भूख सताने लगती है। हमको शान्ति या सन्तोष तभी हो सकता है जब कि सदा के लिए हमारी आवश्यकतायें पूरी हो जावें। और यह केवल