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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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दूसरा अध्याय १६

आत्मिक ज्ञान से सम्भव है। इसलिए ज्ञान की सहायता सबसे बड़ी सहायता है।

संसार के दुःख केवल शारीरिक सहायता से दूर नहीं हो सकते। जब तक मनुष्य अपने मन का संयम और इन्द्रियों का निग्रह नहीं करता, तब तक उसे शारीरिक आवश्यकतायें बराबर सताती रहेंगी और वह क्लेशों से पीड़ित होता रहेगा। चाहे जितनी उसे शारीरिक सहायता पहुँचाई जावे, परन्तु उसके कष्ट दूर न होंगे। अज्ञान ही सारे दुःखों और पापों की जड़ है। अविद्या के अन्धकार को मिटाओ, मनुष्य से कहो कि वह आत्मिक बल प्राप्त करे। यदि मनुष्य को उत्तम शिक्षा दी जावे और उसका आत्मा शुद्ध और बलवान् बना दिया जावे, तो फिर कोई घटना उसे दुःख न पहुँचा सकेगी। भूखों के लिए सदावर्त और रोगियों के लिए औषधालय खोलना धर्म का काम है। परन्तु जब तक मनुष्य को सच्ची शिक्षा न दी जायगी, उसकी भूख तथा रोग सदा के लिए नहीं मिट सकेगा।

भगवद्गीता में बार बार यह उपदेश किया गया है कि नियत हो कर निरन्तर कर्म करना चाहिए। परन्तु कोई कर्म संसार में ऐसा नहीं है, जिसमें धर्म और अधर्म दोनों संयुक्त न हों। किसी कर्म में धर्म अधिक है और अधर्म कम; किसी में अधर्म अधिक और धर्म कम। यह बात स्मरण रक्खो, कोई भी शुभ कर्म ऐसा नहीं है जिसमें पाप का लेश न हो और कोई भी अशुभ कर्म ऐसा नहीं है जिसमें पुण्य का लेश न हो। प्रत्येक कर्म में पाप-पुण्य दोनों मिश्रित रहते हैं। तभी तो इनमें विवेक की आवश्यकता है। विवेक