कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextदूसरा अध्याय २३
नता शुभ और अशुभ इन दोनों से परे है। न पुण्य का बन्धन हो, न पाप का। सोने की ज़ंजीर भी वैसी ही बुरी है जैसी कि लोहे की। कल्पना करो कि मेरे हाथ में काँटा गड़ गया, उसके निकालने के लिए मैंने दूसरे काँटे को ले लिया, जब उससे काम ले चुका अर्थात् काँटा निकल गया, तब दोनों ही को फेंक देता हूँ। मुझको दूसरे काँटे के रखने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हैं तो दोनों ही काँटे। इसी प्रकार शुभ संस्कारों से अशुभ संस्कार तथा पुण्य-वृत्ति से पाप-वृत्ति दबाई या मिटाई जाती है। जब बुरे संस्कार दब गये या मिट गये तब अच्छे संस्कारों को भी दबा लेना चाहिए। केवल यही एक उपाय है जिससे हम कर्म करते हुए उसके प्रभाव से निर्लेप रह सकते हैं। कर्म अवश्य करो, लहरों को आने और जाने दो, पर सावधान रहो कि वे कर्म तुम्हारे मन पर दृढ़ संस्कार न जमाने पावें। मस्तिष्क और मन से बड़े बड़े विचार और आविष्कार होते रहें, किन्तु सावधान रहो कि आत्मा पर उनका प्रभाव न पड़ने पावे। यह किस प्रकार हो सकता है? हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि उस कर्म का प्रभाव, जिससे हमारा घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, हमारे मन पर शेष रहता है।
दिन के समय हज़ारों मनुष्यों को हम देखते हैं और ऐसे मनुष्यों से भी मिलने का संयोग होता है जिनको हम प्यार करते हैं। जब रात को एकान्त में जाकर हम उन आकृतियों का, कि जो दिन में हमने देखी थीं, ध्यान करने लगते हैं तो केवल उनको देखते या स्मरण करते हैं, जिनको हम प्यार करते हैं। सम्भव है कि क्षण भर के लिए ही ये आकृतियाँ हमारी दृष्टि के सम्मुख आई हों, परन्तु