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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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२४ कर्मयोग

स्नेह या प्रेम का सम्बन्ध होने से इन्हीं का प्रभाव मन पर शेष रहता है, शेष सब विस्मृत हो जाती हैं। जिससे जितना अधिक सम्बन्ध होगा, उतना ही अधिक उसका प्रभाव मन पर रहेगा। यद्यपि मन पर सब आकृतियों का प्रतिबिम्ब एक ही रीति पर पड़ता है, तथापि मूर्त्ति उसी की साफ़ उतरती है जिससे मन को कुछ लगाव होता है। चाहे तुमने अपने किसी प्रिय मित्र को निमेष मात्र ही देखा हो और उसको तुम नहीं भूलते और जिनसे तुम्हारा विशेष सम्बन्ध नहीं है, उनको चाहो तुम बहुत देर तक भी देखते रहे हो, पर थोड़ी देर में भूल जाते हो और उनका देखना न देखना बराबर हो जाता है। यही दशा कर्मों की है। यदि तुम फल की वासना रखते हुए कर्म करोगे तो तुम कभी उनके बन्धन से अपने को न बचा सकोगे। हाँ, कर्त्तव्य समझ कर निष्काम भाव से चाहे दिन रात तुम कर्म करते रहो, तुम पर उनका कुछ भी प्रभाव न होगा।

इसलिए, यदि तुम स्वाधीनता चाहते हो तो निःसङ्ग बनो। मस्तिष्क को काम करने दो, मन को रचना-चतुर बना रहने दो, और शरीर को लगातार कर्म करने दो। पर इस बात का ध्यान रहे कि संसार की एक लहर भी मन को चञ्चल और विवश न करने पावे। आगन्तुक या अतिथि की अवस्था में काम करो। रात-दिन कर्म करने में तत्पर रहो, पर संसार की किसी वस्तु से अपने को सम्बद्ध न होने दो। क्योंकि बन्धन या अधीनता आत्मा के लिए जैसी अप्रिय है वैसी और कोई वस्तु नहीं।

यह संसार हमारे रहने की जगह नहीं है, किन्तु हमारे विश्राम के लिए एक पथिकाश्रम (मुसाफ़िरख़ाना) है। सुनो, सांख्य