कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in context२८ कर्मयोग
हो गया। प्रेम का कोष हाथ आ गया और हम स्वाधीन हो गये। प्रकृति का बन्धन टूट गया। हम प्रकृति को उसके वास्तविक रूप रङ्ग में देखने लग जायँगे और फिर वह हमारे बन्धन के लिए नई कड़ियाँ और नई ज़ञ्जीरें न बना सकेगी। जहाँ अधीनता है, वहीं स्वार्थ-बुद्धि है और जहाँ स्वार्थ-बुद्धि है, वहीं फल की इच्छा है। जो मनुष्य स्वाधीन होकर प्रेम के साथ काम करता है, उसको कभी फल की इच्छा न होगी। और जब कि उसका कोई स्वार्थ नहीं है तो कर्म-फल उसके लिए दुःखदायक नहीं हो सकता।
क्या तुम कभी अपने पुत्रों से भी प्रेम का बदला चाहते हो? कभी नहीं। यह तुम्हारा धर्म है कि तुम उनके लिए काम करो। ऐसे ही जहाँ तुमको किसी मनुष्य-विशेष या नगर-विशेष या देश-विशेष के लिए काम करने की आवश्यकता हो वहाँ दृढ़ता और प्रेम के साथ काम करो। पर इनके साथ भी तुम्हारा बर्ताव वैसा ही हो, जैसा अपने लड़कों के साथ हुआ करता है। बदला, सेवा का मूल्य या फल की कभी इच्छा न करो। यदि तुम निःस्वार्थ लोगों को दान देते हो, निष्काम संसार का उपकार कर रहे हो तो विश्वास रक्खो कि तुम्हारा कर्म कभी बन्धन का हेतु न होगा। बन्धन केवल वहाँ होता है, जहाँ फल की इच्छा रहती है।
सेवक की भाँति काम करने में स्वार्थ-बुद्धि कभी जा नहीं सकती और वही बन्धन का हेतु है। यदि तुम स्वामी की भाँति कार्य करो तो उस काम का सच्चा प्रेम और आनन्द होगा। हम लोग प्रायः न्याय और अधिकार के विषय में वाद-विवाद करते रहते हैं। पर हम देखते हैं कि संसार में न्याय और अधिकार की वातें बच्चों