कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextदूसरा अध्याय
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की बकवास से अधिक गौरव नहीं रखतीं। केवल दो वस्तुएँ हैं, जो मनुष्य के चारित्र्य की रचना या रक्षा करती हैं। एक दया और दूसरी शक्ति। शक्ति के घमण्ड में रहना और उसका अभ्यास करना स्वार्थ-परता है। प्रत्येक पुरुष या स्त्री अपने अधिकार और शक्ति से लाभ उठाने की चिन्ता में अहर्निश व्यग्र रहते हैं। दया स्वर्ग का द्वार है, जिसको धर्मात्मा बनना हो वह दया करे। न्याय, अधिकार और शक्ति इन सब का यथार्थ उपयोग भी दया पर निर्भर है। कर्म का बदला चाहने से आत्मिक उन्नति के मार्ग में रुकावट उत्पन्न होती है, जिससे आत्मा दुःखित होता है। फल से कुछ सम्बन्ध न रख कर केवल कर्म करने से बन्धन नहीं होता।
एक दूसरा उपाय भी है जिससे दया और निःस्वार्थ उदारता को चरितार्थ किया जा सकता है। वह यह है कि कर्म को "उपासना" समझ कर करो। यदि तुमको एक ईश्वर पर विश्वास है तो यह कर्म ही उसकी उपासना है। अतएव कर्म करो और उस का फल ईश्वर के अर्पण कर दो। जब तुम ईश्वर के उपासक हो तो फिर तुमको कब यह अधिकार है कि उससे उन कर्मों के फल की वाञ्छा रक्खो, जो तुम संसार के लिए कर रहे हो। ईश्वर स्वयं बिना किसी के सम्बन्ध और बिना किसी स्वार्थ के काम करता है। इसी प्रकार तुम भी करो। जैसे जल कमल-पत्र को तर नहीं कर सकता वैसे ही निष्काम कर्म करनेवालों के लिए कर्म बन्धन का हेतु नहीं होता। निःस्वार्थ पुरुष चाहे बड़े से बड़े नगर में रहे, चाहे वह निरन्तर पापियों से घिरा रहे, परन्तु वह कभी पाप-कर्म न करेगा।