कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
Page 40 of 115
Read in context३४ कर्मयोग
अनुसन्धान करने की आवश्यकता प्रतीत होती है । धर्म के विषय में यह भाव सर्वगत मालूम होता है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने आत्मा के अनुकूल काम करना चाहिए । परन्तु प्रश्न यह है कि वह क्या वस्तु है, कि जो हमारे कर्म को धर्म का पर्याय बनाती है ? यदि किसी ईसाई को गोमांस मिल जाय और वह अपने प्राण बचाने के लिए उसको काम में न लावे तो वह समझेगा कि उसने पाप किया । परन्तु यदि किसी हिन्दू से ऐसा काम हो जाय तो वह इसे आत्मघात से भी अधिक पाप समझेगा । ये सब बातें सामयिक शिक्षा और संसर्ग के फल हैं । पिछली शताब्दी में भारतवर्ष में लुटेरों के समुदाय रहते थे, जिनको ठग कहते थे । मार्ग चलते हुए पथिकों को मार कर उनकी सम्पत्ति लूट लेना ही वे अपना धर्म समझते थे । जितने अधिक मनुष्यों की वे हिंसा करते थे, वे समझते थे कि उतनाही अधिक हमने धर्म का काम किया है, वैसे यदि भूल से भी किसी की गोली किसी के लग जाय तो उसे पश्चात्ताप होगा और वह समझेगा कि मैंने पाप किया है । यदि वही मनुष्य सिपाही बन कर लड़ाई में जावे तो एक दो को नहीं, किन्तु बीसियों मनुष्यों को मार गिरावेगा और इस बात का अभिमान करेगा कि मैंने धर्म का काम किया है । इसलिए धर्म के विषय में सर्वत्र एक ही प्रकार की व्यवस्था देना भारी भूल होगी पर तो भी धर्म का कुछ निरूपण किया जा सकता है । जिन कामों के करने से हम ईश्वर की ओर चलते हैं, या जिनसे हम ईश्वर की समीपता प्राप्त करते हैं, वे धर्म हैं। और जिन कर्मों के करने से हम ईश्वर से विमुख या दूर होते हैं या जो काम हम