कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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गये हैं अर्थात् किसी इच्छा से प्रेरित होकर कर्म नहीं करते, किन्तु अपना धर्म समझ कर करते हैं, उनके लिए न कोई कर्म उच्च है न नीच। उन्होंने राग और स्वार्थ की जड़ को काट दिया है। उनका आत्मा हंस के समान उच्चगामी होकर स्वाधीनता के आकाश में उड़ा करता है, कोई उसे बन्धन में नहीं ला सकता। हम में यह बड़ा दोष है कि हम अपने आपको बहुत बड़ा समझते हैं। जब मैं बालक ही था, स्वप्न में देखा करता था कि मैं राजा हूँ, मुझ में यह बड़ाई है, यह महत्व है। शायद तुमको भी ऐसे स्वप्न दीखते हों। पर यथार्थ में यह स्वप्न ही हैं। हमारे कर्त्तव्य चाहे वे कुछ ही क्यों न हों, सर्वदा और सर्वत्र हमारी अवधानता चाहते हैं। यदि हम अपने सामयिक कर्त्तव्य का सम्यक् पालन करें तो जो काम इस समय हमारे हाथ में है, वह हमारी दृढ़ता का कारण बन जायगा और धीरे धीरे हम किसी ऐसे अधिकार और पदवी को प्राप्त होंगे, जिसकी सोसायटी में बड़ी प्रतिष्ठा की जाती है। ईर्ष्या और अस-हिष्णुता से मन की अशान्ति बढ़ती है, दया और उदारता से ऋजुता और नम्रता बढ़ती है। भाग्य और समय को दोष देनेवाले सदा अपना रोना रोया करते हैं। उनको शान्त और प्रसन्न करना कठिन काम है। उनका जीवन सदा उनके लिए प्रतिकूल बना रहता है।
आओ ! हम तुम सब अपना अपना कर्म करें, जो हमारा धर्म है, उसको दृढ़ता से पकड़ रक्खें। चलते हुए पहियों में कन्धों को लगा कर अपने सारे बल से इस कर्म की गाड़ी को खींचो फिर तुम देखोगे कि यह किस प्रकार संसार की दलदल से पार होकर तुम्हें अपने अभीष्ट स्थान में पहुँचाती है।