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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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चौथा अध्याय

परमार्थ में स्वार्थ

पूर्व इसके कि हम इस बात को बतावें कि धर्म के पालन करने से कहाँ तक हमारे आत्मा की उन्नति होती है, हमको संक्षेप से यह बता देना चाहिए कि भारतवर्ष में कर्म से क्या तात्पर्य्य लिया जाता है। प्रत्येक धर्म में तीन बातें होती हैं। (१) दर्शनशास्त्र, (२) उपाख्यान, (३) कर्म-काण्ड। इसमें सन्देह नहीं कि दर्शन-शास्त्र ही सारे मतों का आधार है। उपाख्यानों से महापुरुषों के जीवन-चरित्र और इतिहास के प्रसङ्ग में दर्शन की सजीव आकृति दिखलाई जाती है। कर्म-काण्ड और भी अधिक विस्तार के साथ दर्शन के प्रचार का प्रबन्ध करता है। इन सब के संघात को आगम या शास्त्र कहते हैं। प्रत्येक धर्म में कर्म-काण्ड सब से प्रधान अंश है। हम में से प्रत्येक मनुष्य आध्यात्मिक सिद्धान्तों को उस समय तक नहीं समझ सकता, जब तक उसमें आत्मिक शक्तियों का विकास न हो जावे। मनुष्य प्रत्येक बात में अपने को निपुण और योग्य समझता है, परन्तु जब काम करने का समय आता है तब उन सिद्धान्तों का समझना बड़ा कठिन हो जाता है। इसी लिए उन सिद्धान्तों की मूर्त्ति या रूपक बनाने का प्रबन्ध किया गया। इस प्रकार के चिह्न या संकेत प्रत्येक धर्म में हैं। हम लोग

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