कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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बिना संकेतों के और किसी प्रकार से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। शब्द क्या हैं? हमारे भावों या विचारों की कृत्रिम मूर्त्तियाँ हैं। यह ब्रह्माण्ड भी इसी प्रकार की एक बड़ी मूर्त्ति है, जिसके भीतर परमात्मा गुप्त रीति से बैठा हुआ है। इन संकेतों को केवल मनुष्य ने नहीं बनाया। यह बात नहीं है कि एक धर्म के कुछ मनुष्य इकट्ठे हो कर बैठ गये और उन्होंने आपस में सम्मति करके कुछ संकेत बना लिये। ये संकेत स्वाभाविक हैं और क्रमशः इनकी उन्नति हुई है। अन्यथा यह कैसे सम्भव होता कि किन्हीं किन्हीं संकेतों के विषय में सब या प्रायः मनुष्यों के भाव या विचार एक से हो जाते। बहुत लोग समझते हैं कि मसीही-सूली का सम्बन्ध केवल ईसाई धर्म से है। पर यथार्थ में सूली का चिह्न मूसा की उत्पत्ति से पहले संसार में वर्त्तमान था। फेन्शीन और अजटक जातियों में मसीह की भावना उस समय से पाई जाती है, जब संसार को इतिहास लिखने का ज्ञान भी न था। इसी प्रकार सूली-प्राप्त मुक्ति-दाता की कल्पना भी किसी न किसी रूप में सब धर्मों में पाई जाती है। प्रत्येक महापुरुष की आकृति के आस पास मण्डलाकार वृत्त का चिह्न भी सदा से देखने में आता है। इसके सिवा स्वस्तिक का चिह्न भी सर्वत्र ही पाया जाता है। पहले प्रायः लोग यह समझते थे कि बौद्धों के कारण यह चिह्न संसार में फैल गया। पर खोज करने से प्रमाणित हुआ है कि बौद्धों से हज़ारों वर्ष पहले के लोगों में इसका प्रचार था। बाबुल और मिस्र में भी वह प्रचलित था। इससे सिद्ध है कि इन संकेतों को केवल सामयिक आवश्यकता ने नहीं उत्पन्न किया, किन्तु इनका