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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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चौथा अध्याय

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कोई न कोई कारण अवश्य है, क्योंकि इनको सर्वत्र मनुष्य के मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार का सम्बन्ध रहा है। इसी प्रकार भाषा भी केवल मनुष्य-रचित नहीं है, ऐसा कभी नहीं हुआ कि कुछ मनुष्य मिल कर इकट्ठे बैठ गये हों और यह सम्मति कर ली हो कि आओ, हम अपने भावों को प्रकाश करने के लिए कुछ शब्द गढ़ लें। शब्द और अर्थ को कोई मनुष्य एक दूसरे से पृथक् नहीं कर सकता। गूँगे और बहरे तक शब्द के संकेतों पर सोचते और विचार करते हैं। प्रत्येक भाव का मस्तिष्क में एक चित्र-विशेष खिंचा हुआ होता है। वेदान्त की परिभाषा में इसी को नाम और रूप कहते हैं। ये दोनों अनादि हैं, इनको कोई उत्पन्न नहीं कर सकता। संसार के शास्त्रीय सङ्केतों में हमको मनुष्य के धार्मिक सिद्धान्तों का पता मिलता है। यह कहना कि कर्म या उपासना की कोई आवश्यकता नहीं है, सुगम है। आज कल एक बालक भी ऐसा कहा करता है। परन्तु यह बात सुगमता से जानी जा सकती है कि जो लोग मन्दिर (स्थान-विशेष) में पूजा किया करते हैं, वे उन लोगों से भिन्न हैं, जो पूजा नहीं करते। इसलिए मन्दिर-विशेष, कर्म-विशेष और चिह्न-विशेषों का धर्म-विशेषों से सम्बन्ध है और प्रत्येक धर्म के अनुयायी उन चिह्नों से परमार्थ को सिद्ध करते हैं। अतएव कर्म की उपेक्षा करना ठीक नहीं। कर्मयोग के सम्बन्ध में इन सब बातों का जानना आवश्यक है।

इस कर्मयोग-विज्ञान के अनेक अङ्ग हैं। उनमें से एक यह है कि शब्द और अर्थ में क्या सम्बन्ध है और शब्द की शक्ति से क्या प्राप्त हो सकता है। प्रत्येक धर्म में शब्द की शक्ति स्वीकार की गई

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