कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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है और इस पर इतना अधिक बल दिया गया है कि कोई कोई धर्म तो केवल शब्द से ही सृष्टि की उत्पत्ति मानते हैं। ईश्वर के ज्ञान का वाह्य चिह्न भी शब्द ही है। ईश्वर ने पहले सोचा या इच्छा की, इसलिए यह सृष्टि शब्द से उत्पन्न हुई। आज-कल प्रकृति-विज्ञान उन्नति पर है, इसलिए लोगों की वृद्धि ऊपर की तरफ़ नहीं जाती। हृदय कठोर हो रहे हैं। जितने ही जो लोग अधिक आयुवाले हैं, उतने ही वे संसार के कुत्ते बने जा रहे हैं और उनमें उसी परिमाण से कठोरता आ रही है और प्रमाद बढ़ रहा है। तो भी कभी कभी मनुष्यता का ध्यान आ ही जाता है और कोई कोई साधारण सी बातें मनुष्य को तत्त्वानुसन्धान की ओर आकर्षित कर ही देती हैं और फिर इसको ज्ञान का आश्रय लेना ही पड़ता है। यदि हम दर्शन-शास्त्र और शब्द-शास्त्र के धार्मिक मूल्य की थोड़ी देर के लिए उपेक्षा करके देखें, तब भी हमको मानना पड़ेगा कि मनुष्य-जीवन के अभिनय में कर्म ने बहुत बड़ा काम किया है। मैं तुमसे केवल बातचीत कर रहा हूँ, तुमको छूता नहीं। मेरी उच्चारण-क्रिया से वायु में लहरें उठती हैं और मेरे शब्द तुम्हारे कान में जाकर तुम्हारी रगों और नसों को छूते हैं और तुम्हारे मन पर प्रभाव डालते हैं। तुम इस प्रभाव को रोक नहीं सकते। यह शब्द की विचित्र शक्ति है। एक मनुष्य दूसरे को अपशब्द कहता है, दूसरा मुष्टिप्रहार से उसके मुँह को लाल कर देता है। यह भी शब्द का ही प्रभाव है। और भी शब्द के प्रभाव पर ज़रा ध्यान दो। एक मनुष्य दुःख से मर्माहत होकर विलाप कर रहा है, दूसरा उसके पास आकर मधुर और शान्ति-पूर्ण वचनों से आश्वा-