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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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कर्मयोग

लगती। अब मुझे धमकाता है कि यदि काम न देगा तो तुझे खा जाऊँगा। यह कह ही रहा था कि भूत वहाँ आ पहुँचा और मुँह खोल कर उसकी ओर झपटा। दरिद्र डर के मारे काँपने लगा और फिर महात्मा से प्राण बचाने की प्रार्थना करने लगा। साधु ने कहा—अच्छा, मैं तुझको इस कष्ट से बचाऊँगा। देख, इस कुत्ते की पूँछ टेढ़ी है, छुरी से काट डाल और भूत से कह, इसे सीधी करे। दरिद्र ने पूँछ काट ली और भूत से कहा, इसको सीधी कर दे। भूत ने पूँछ को हाथ में लेकर धीरे धीरे सीधा करना शुरू किया। वह सीधी हो गई, परन्तु जब उससे हाथ हटाया तो वह फिर टेढ़ी की टेढ़ी हो गई। उसने बार बार यत्न किया और दिन-रात उसमें लगा रहा, पर वह सीधी न हुई। निदान वह थक गया और कहने लगा कि ऐसी विपत्ति से कभी पहले मेरा पाला नहीं पड़ा था। भाई ! मैं हार गया। अब तेरे साथ मेल कर लूँ। जो कुछ मैंने तुझको दिया है, वह तू सब ले जा और मुझको छोड़ दे। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि कभी तुझको न सताऊँगा। दरिद्र ने प्रसन्नता से उसकी बात मान ली और उसको छोड़ दिया।

यह संसार भी कुत्ते की टेढ़ी पूँछ है। लोग सदा से इसके सीधा करने की चेष्टा करते आये हैं; सैकड़ों वर्ष तक यत्न किये; परन्तु यह टेढ़ी की टेढ़ी ही रही। पहले मनुष्य को सोचना चाहिए कि कर्म करने का ढंग क्या है। मनुष्य चाहे कुछ करे, पर उसमें कट्टरपन, क्षुद्रमनस्कता और पक्षपात न होना चाहिए। जो लोग कट्टर होते हैं, वे हो न हो दूसरों के साथ उलझते रहते हैं। सुनो, शिकागो (अमेरिका) में एक कुलीन स्त्री रहती है। उसने