कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextचौथा अध्याय ५५
एक मकान बनाया है जिसमें और स्त्रियाँ व्यायाम ( वरज़िश ) आदि करने जाती हैं। एक दिन यह स्त्री शराब और तम्बाकू के विरुद्ध बातचीत कर रही थी। उसने मुझसे कहा—‘‘मैं इसका उपाय जानती हूँ।’’ मैंने पूछा—‘‘वह क्या है ?’’ उसने कहा—‘‘क्या तुमने मेरे मकान का हाल नहीं सुना ?’’ इस स्त्री के मस्तिष्क में यह बात समा गई है कि जो मनुष्य उसके मकान में आवे उसमें चाहे कैसा ही व्यसन और दुर्गुण क्यों न हो, वह धर्मात्मा और सदाचारी बन जायगा। भारतवर्ष में भी ऐसे कट्टर मौजूद हैं। वे कहते हैं, यदि किसी स्त्री को दो तीन पति बनाने का अवसर मिल जाय तो उसकी सारी बुराई जाती रहेगी। इसी को कट्टरपन कहते हैं। बुद्धिमान् मनुष्य कट्टर नहीं होते। कट्टर आदमी कोई भी उपयोगी काम नहीं कर सकता। यदि संसार में कट्टरपन न होता तो अब तक इसकी बहुत अधिक उन्नति हो गई होती। जहाँ कट्टरपन होता है वहाँ क्रोध और द्वेष दोनों बढ़ते हैं। जिनसे लोग छोटी छोटी तुच्छ बातों के लिए आपस में लड़ने-झगड़ने लगते हैं। यदि तुम उस कुत्ते की पूँछ की कहानी याद रक्खोगे तो कट्टरपन से बच जाओगे। संसार के लिए चिन्तित और व्यग्र होना व्यर्थ है। तुम चाहे कुछ करो, संसार ज्यों का त्यों रहेगा। सृष्टि परमात्मा की है, वही इसका अधीश्वर और नायक है। इसलिए उसकी आज्ञा से सृष्टि-नियम जो कुछ काम कर रहे हैं, उनके विरुद्ध कट्टरपन से अपनी शक्ति का अपव्यय मत करो। जब तक तुम पर यह कट्टरपन का भूत सवार है, तब तक तुम्हारे लिए न तो यह संसार ही सीधा होगा और न तुम अपने को ही सीधा बना सकोगे।