कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextचौथा अध्याय
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उस देश में बहुत से पुरुष केवल अपनी स्त्रियों के अत्याचार से तङ्ग आकर शराब पीने लग जाते हैं और इस रीति पर अपने दुःख को कम करते हैं।
किन्हीं किन्हीं कर्कशा स्त्रियों के स्वभाव में अनुचित स्वतन्त्रता (स्वैरिता) का कुछ ऐसा प्रभाव जम गया है कि वह पति को छाया के समान अपने पीछे रखना चाहती हैं और जहाँ पति ने उनकी इच्छा या रुचि के विरुद्ध एक शब्द भी कहा, उस बेचारे की ऐसी दुर्गति करती हैं कि उसको सिवा आत्मघात के और कुछ नहीं सूझता। इस प्रकार की स्त्रियाँ पश्चिमी देशों में पूर्वी देशों की चुड़ैलों से बढ़कर हैं। लोभी पादरी इनका पक्ष लेकर कहते हैं, “धन्य लेडियो! तुम्हीं संसार की शक्ति और शोभा हो” और इस प्रशंसा से फूल कर लेडियाँ अपने धन और बल से पादरियों की सहायता करती हैं। इस प्रकार के दृश्य यूरोप व अमेरिका में जहाँ तहाँ दृष्टि पड़ेंगे।
इस प्रसङ्ग के उपसंहार में तुमको इतनी बातें याद रखनी चाहिएँ:—
(१) हम, तुम, और सब लोग संसार के ऋणी हैं, और संसार हमारा ऋणी नहीं है। संसार की सहायता करने में हम अपनी सहायता आप करते हैं।
(२) इस संसार का नियामक और रक्षक ईश्वर है। इसको तुम्हारी सहायता की कुछ भी आवश्यकता नहीं। ईश्वर की दया की छाया सदा इस संसार पर है, वह सर्वज्ञ और नित्य सदा इसकी रक्षा और सहायता में तत्पर रहता है। जब संसार सो