BharatKosha
कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

Page 64 of 115

Read in context
Page 64

५८ कर्मयोग

जाता है, वह जागता रहता है। उसको कभी नींद नहीं आती और वह बराबर अपना काम करता रहता है।

(३) हमको किसी से द्वेष या वैर नहीं करना चाहिए। संसार पाप-पुण्य से मिश्रित है, इसमें बुराई-भलाई सदा से होती आई है। हमारा धर्म है कि निर्बल और पापी मनुष्यों के साथ भी दया और सहानुभूति रखें।

(४) हमको कट्टर न बनना चाहिए, क्योंकि कट्टर मनुष्य में प्रेम और सहानुभूति नहीं होती। कट्टर मनुष्य कहा करते हैं कि "हम पापी से द्वेष नहीं करते, किन्तु पाप से द्वेष करते हैं।" परन्तु मैंने आज तक कोई भी ऐसा कट्टर नहीं देखा जो पाप और पापी में विवेक (तमीज़) करता हो। यह कह देना सहज है, पर विवेक करना ज़रा कठिन काम है।

(५) कभी अपने स्वभाव में क्रोध और चिड़चिड़ापन न आने दो। जितनी अधिक प्रीति और शान्ति तुम में होगी, उतना ही तुम्हारा परिणाम अच्छा होगा।