कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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कर्मयोग
गणना है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के हित का नाश करते हैं। ऐसे लोग अधम कोटि के हैं। राजर्षि भर्तृहरि जी का कथन है कि संसार में एक चौथी श्रेणी के मनुष्य और भी हैं। वे कौन हैं ? जो अकारण अर्थात् अपना भी कोई लाभ नहीं, पर दूसरों को हानि पहुँचाते हैं। जिस प्रकार उच्च-कोटि में वे धर्मात्मा मनुष्य हैं जो आप हानि उठा कर भी दूसरों को लाभ पहुँचाते हैं, वैसे ही अधम कोटि में वे नीच मनुष्य हैं, जो अपने लाभ के लिए दूसरों को हानि पहुँचाते हैं। परन्तु जो अकारण दूसरों की हानि करते हैं, अपना कोई लाभ नहीं तो भी दूसरे के हित में बाधा डालते हैं, ऐसे कुटिल-स्वभाव मनुष्यों के लिए मानव-कोश में कोई शब्द नहीं मिलता, जिससे उनको सम्बोधित किया जावे। श्रीमान् भर्तृहरिजी की सम्मति में सबसे उच्च कोटि के वे मनुष्य हैं, जिनके हृदय में सच्चा त्याग है और जो दूसरों के लिए अपना जीवन-दान कर देते हैं।
संस्कृत में दो शब्द हैं, प्रवृत्ति और निवृत्ति। संसार से सम्बन्ध का नाम प्रवृत्ति है और संसार से उपरत होना निवृत्ति कहलाती है। प्रवृत्ति में "मेरा", "तेरा" पन रहता है। काम, अहङ्कार और स्वार्थ के भाव इसमें बने रहते हैं; पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा इन तीनों एषणाओं के संस्कार जाग्रत रहते हैं। दूसरे शब्दों में प्रवृत्ति की व्याख्या यों भी की जा सकती है कि दूसरों से छीन कर सारा धन और ऐश्वर्य अपने अधिकार में कर लिया जावे। निवृत्ति मार्ग वह है, जिसमें मनुष्य कर्म तो करता है, पर अपने लिए कुछ नहीं करता। अपना पराया यह भाव ही