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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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पाँचवाँ अध्याय ६७

निवृत्ति में नहीं रहता। कर्म से विमुख होने का नाम निवृत्ति नहीं है किन्तु प्रवृत्ति और निवृत्ति ये दोनों कर्म के ही भेद हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि प्रवृत्ति में कर्म अपने लिए किया जाता है और निवृत्ति में दूसरों के लिए; या यह कि सकाम कर्म का नाम प्रवृत्ति है और निष्काम कर्म का नाम निवृत्ति; बिना त्याग और वैराग्य के कोई निवृत्ति-मार्ग का पालन नहीं कर सकता। कर्म-योग का यही सबसे बड़ा पद है और यही उसका अन्तिम फल है।

चाहे मनुष्य दर्शन-शास्त्र से अनभिज्ञ हो, चाहे वह ईश्वर पर भी विश्वास न रखता हो और उसने अपने जीवन में एक बार भी ईश्वर से प्रार्थना न की हो परन्तु यदि कर्मयोग की प्रबल शक्ति ने उसको इस अवस्था पर पहुँचा दिया है कि वह दूसरों के लिए अपना जीवन तक अर्पण कर सकता है तो वह उसी पदवी का अधिकारी है जो ज्ञान, उपासना और भक्ति से प्राप्त होती है। क्योंकि इन सब का अन्तिम उद्देश तथा फल एक ही है और ये सब अपने आपे को मिटानेवाले हैं। दूसरों की भलाई में अपने जीवन को अर्पण करनेवाला (चाहे उसके धार्मिक वा दार्शनिक सिद्धान्त कुछ हो हों) सब का पूजनीय तथा आदरणीय होगा। यहाँ जाति और धर्म के प्रश्न को अवकाश ही नहीं होता। वे लोग जो उसके साथ धार्मिक भेद रखते हैं, जब उसके त्याग व औदार्य आदि उच्च भावों को देखेंगे तब उनके हृदय में उसके लिए सच्चा गौरव और आदर उत्पन्न होगा। ईसाई-देशों में एक भी ऐसा कट्टर ईसाई न मिलेगा जिसने, "एडविन आरनेल्ड" की पुस्तक "लाइट आफ़ एशिया" को पढ़ कर "गौतम बुद्ध" के महत्व में अपने सिर