करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवापिस चले आए तो यह देखकर अत्यंत दुखी हुए कि जिस जगह पर वे बैठे हुए थे, उस जगह को विष्णु जी और लक्ष्मी जी साफ़ कर रहे हैं। नारद जी को बुरा लगा; कहने लगे - हे प्रभु! क्या मैं इतना गंदा हूँ कि जहाँ बैठा था, वहाँ सफ़ाई कर रहे हो! विष्णु जी ने गंभीर होकर कहा – हाँ नारद ! यह सच है, तू बड़ा गंदा है, क्योंकि तूने गुरु नहीं किया है। नारद जी चौक गये। प्रभु ! मैं इतना ब्रह्मज्ञानी; मुझे क्या ज़रूरत है गुरु की ? विष्णु जी ने कहा- नहीं, गुरु तो तुम्हें करना ही पड़ेगा। नारद जी ने पूछा- हे प्रभु! फिर मैं किसे गुरु मानूँ ? विष्णु जी ने बताया कि दक्षिण दिशा में सुबह-सुबह निकल पड़ना; जो पहला मनुष्य मिल जाए, उसे ही अपना गुरु मान लेना। नारद जी वहाँ से चल पड़े। सुबह जब नारद जी दक्षिण दिशा में जा रहे थे तो सामने उन्हें एक मछुआरा आता दिखाई दिया। मछुआरे ने रात को जाल लगाया था, सुबह देखने के लिए आ रहा था कि कितनी मछलियाँ पकड़ में आई हैं। नारद जी घबरा गये...... अब सत्यानाश हो गया; यह मछुआरा मिल गया; क्या अब इसी को गुरु बनाना पड़ेगा ! पर विष्णु महाराज की आज्ञा थी.......क्या करते! उसके पास आ गये; कहने लगे, मुझे दीक्षा दीजिए, मैं आपको गुरु धारण करने आया हूँ । मछुआरा कहने लगा कि मैं तो नीची जाति का हूँ, धीमर हूँ; आप ऊँची जाति के लग रहे हैं, जनेऊ पहन रखा है। कौन हैं आप ? नारद जी ने बताया—मैं ब्रह्मा का बेटा नारद हूँ । मछुआरा बेचारा प गया। ओ नारद महाराज - आप ! यह आप क्या कह रहे हैं ! भला मैं आपको क्या दीक्षा दूँगा ! नारद जी कहने लगे- नहीं ! मुझे आप ही को गुरु धारण करना है; विष्णु जी की आज्ञा है। पहले तो मछुआरा माना नहीं, पर जब नारद जी ने बहुत समझाकर कहा कि विष्णु महाराज की आज्ञानुसार उन्हें आप ही को गुरु करना है, तब कहीं जाकर उसने डरते-डरते बैठकर नारद जी को दीक्षा दी। नारद जी गुरु को प्रणाम करके चल पड़े और वैकुण्ठ में विष्णु जी के पास पहुँचे। विष्णु जी ने पूछा- कहो नारद! गुरु बना आए। नारद जी कहने लगे - गुरु तो बनाया, पर....... 'खामोश नारद' कहते हुए नारद को वहीं रोक लिया विष्णु जी ने । गुरु करके 'पर' लगा रहा है। 'पर' यानी कमी 'पर' यानी निंदा। जा! चौरासी भोग। ज्ञानी होकर मेरे आगे गुरु की निंदा ! जा ! चौरासी भोग । नारद जी डर गये कि अब तो चौरासी लाख योनियों में जाना पड़ेगा;