भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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निरंजन धन तुमरो दरबार, जहाँ तनिक न न्याय विचार ॥

रंगमहल में बसें मसखरे, पास तेरे सरदार ।

धूर-धूप में साधू बिराजैं, भये जो भवनिधि पार ॥

वेश्या ओढ़े खासा मलमल, गल मोतियन को हार ।

पतिव्रता को मिले न खादी, सूखा निरस अहार ॥ पाखण्डी को जग में आदर, संत को कहैं लबार ।

अज्ञानी को परम विवेकी, ज्ञानी को मूढ़ गँवार ॥

कहहिं कबीर फकीर पुकारी, उलटा सब व्यवहार।

साँच कहे जग मारन धाये, झूठन को एतबार ॥

साहिब कह रहे हैं कि हे निरंजन ! तेरे दरबार में कोई न्याय नहीं है । भवसागर पार करने वाले साधुओं को धूप में तपना पड़ता है। वेश्या तो मलमल के कपड़े पहनती है और उसके गले में मोतियों का हार पड़ा रहता है। दूसरी ओर पतिव्रता को खादी तक नसीब नहीं होती और खाना भी उसे रूखा-सूखा ही मिलता है। जो पाखण्डी साधु हैं, उनका तो तेरे दरबार में बड़ा ही आदर होता है, पर जो सच्चे संत हैं, उन्हें दुनिया झूठा कहती है । जो अज्ञानी लोग हैं, केवल किताबें पढ़कर दुनिया को बुद्ध बनाते हैं, दुनिया कहती है कि बड़े ही ज्ञानवान हैं। दूसरी ओर जो ज्ञानी लोग हैं, अपने अनुभव की बात कहते हैं, उन्हें दुनिया मूर्ख और अनपढ़ कहती है । निरंजन के इस संसार के सब काम उलटे हैं। जो सच्चे परमात्मा की बात कहने वाला है, उसे दुनिया मारने को दौड़ती है और जो झूठे परमात्मा यानी निरंजन की बात कहने वाला है, उसकी बातों पर विश्वास कर लेती है । ... तो भाइयो, आपकी कसौटी ली जायेगी, पर आप निश्चिंत रहना। आप दृढ़ रहना। आपका विरोध होगा दुनिया के लोगों में भक्ति का नूर दिखाई नहीं दे रहा है । भक्ति समाप्त हो गयी है, केवल दिखावा रह गया है । आप देखना, आदमी पाप कर्म की तरफ चल पड़ा है और अपने को भक्त भी कहला रहा है। वो कह रहा है कि