करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिया था। पहले सत्य-पुरुष ने उसे मिटाने की बात भी सोची, लेकिन तब तक वे उसे 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य करने का 'शब्द' दे चुके थे; अतः ऐसा करने से उनका शब्द कट जाता था। जब निरंजन जीवों को तप्त शिला पर भून भून कर खा रहा था, उन्हे अनेकानेक कष्ट दे रहा था, तब सब जीवों ने मिलकर सत्य - पुरुष को पुकारा। सब जीवों ने मिलकर कहा कि यदि कोई परमात्मा है तो हमें बचाओ ! काल-पुरुष का दण्ड हमसे सहा नहीं जा रहा। अब निरंजन को मिटाया भी नहीं जा सकता था, क्योंकि उसे शब्द मिल चुका था और जीवों की पुकार को अनसुना भी नहीं किया जा सकता था। साहिब भी अब करे तो क्या करे ! अब साहिब ने स्वयं को मथा और अपने में से ही एक परम - सत्ता निकाली। जैसे दही के मथने पर घी बाहर आ जाता है, वैसे ही साहिब ने अपने को मथ साहिब - सत्य - कबीर को निकाला और उनसे कहा कि जीवों को शून्य में निरंजन बड़ा कष्ट दे रहा है, उन्हें छुड़ाओ । एक बार तो कबीर साहिब ने निरंजन का शीश ही उखाड़ फेंका, लेकिन फिर सत्य-पुरुष के शब्द का ख्याल करके पुनः सुरति करके जोड़ दिया । कबीर साहिब कभी-2 इस संसार में सद्गुरू रूप में अवतरित होकर युक्ति - 2 रूप से जीवों को सत्य - भक्ति में लगाकर अमर - लोक लेने आते हैं। चूंकि यहाँ पर सब काल - पुरुष की भक्ति में लीन हैं, इसलिए यह काम थोड़ा कठिन भी हो जाता है । सब जीव आसानी से उन्हें समझ नहीं पाते हैं और उलटे उन्हीं के शत्रु हो जाते हैं । इसलिए जो सत्य - पुरुष के अंकुरी जीव हैं वे सत्यगुरू की शिक्षा सुनकर ऐसे दौड़कर मिलते हैं जैसे लोहे से चुम्बक चिपट जाता है और जो काल - पुरुष के जीव हैं उन पर सत्य-पथ की शिक्षा का कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है । विडम्बना यही है जीव साहिब से बिछुड़ कर काल की दुनिया में अनेक कष्ट सहते हुए भी बार-बार काल-पुरुष के जाल में उलझ रहे हैं और पुनः साहिब से मिलने का प्रयत्न नहीं कर रहे। सब गफलत की नींद में सो रहे हैं। तभी तो साहिब चेता रहे हैं-
कबीर सोकर क्या करे, उठ और उठकर जाग ।
जिनके संग से बिछुड़ा, वा ही के संग लाग ॥