भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५


ब्रह्मास्ति । तदेवामृतमविनाशि<br>उच्यते सर्वशास्त्रेषु । किं च<br>पृथिव्यादयो लोकास्तस्मिन्नेव सर्वे<br>ब्रह्मण्याश्रिताः सर्वलोककारण-<br>त्वात्तस्य । तदु नात्येति कश्चन<br>इत्यादि पूर्ववदेव ॥ ८ ॥गुह्य ब्रह्म नहीं है । वही सब<br>शास्त्रोंमें अमृत—अविनाशी कहा<br>गया है । यही नहीं, उस ब्रह्ममें<br>ही पृथिवी आदि सम्पूर्ण लोक<br>आश्रित हैं, क्योंकि वह सभी लोकोंका<br>कारण है । उसका कोई भी<br>अतिक्रमण नहीं कर सकता<br>[ निश्चय यही वह ब्रह्म है ] इत्यादि<br>[ आगेकी व्याख्या ] पूर्ववत् समझनी<br>चाहिये ॥ ८ ॥

अनेकतार्किककुबुद्धिविचालि-<br>तान्तःकरणानां प्रमाणोपपन्नम्<br>अप्यात्मैकत्वविज्ञानमसकृदुच्य-<br>मानमप्यनृजुबुद्धीनां ब्राह्मणानां<br>चेतसि नाधीयत इति तत्प्रति-<br>पादन आदरवती पुनः पुनराह<br>श्रुतिः—अनेक तार्किकोंकी कुबुद्धिद्वारा<br>जिनका चित्त चञ्चल कर दिया<br>गया है, अतः जिनकी बुद्धि सरल<br>नहीं है उन ब्राह्मणोंके चित्तमें,<br>प्रमाणसे युक्त सिद्ध होनेपर भी,<br>आत्मैकत्व-विज्ञान बारम्बार कहे<br>जानेपर भी स्थिर नहीं होता । अतः<br>उसके प्रतिपादनमें आदर रखनेवाली<br>श्रुति पुनः पुनः कहती है—

आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥