कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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जो एक, सबको अपने अधीन रखनेवाला और सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा अपने एक रूपको ही अनेक प्रकारका कर लेता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्मदेवको जो धीर (विवेकी) पुरुष देखते हैं उन्हींको नित्यसुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥ १२ ॥
| स हि परमेश्वरः सर्वगतः स्वतन्त्र एको न तत्समोऽभ्यधिको वान्योऽस्ति। वशी सर्वं ह्यस्य जगद्वशे वर्तते। कुतः? सर्वभूतान्तरात्मा। यत एकमेव सदैकरसमात्मानं विशुद्धविज्ञानरूपं नामरूपाद्यशुद्धोपाधिभेदवशेन बहुधानेकप्रकारं यः करोति स्वात्मसत्तामात्रेणाचिन्त्यशक्तित्वात्। तमात्मस्थं स्वशरीरहृदयाकाशे बुद्धौ चैतन्याकारेणाभिव्यक्तमित्येतत्। | वह स्वतन्त्र और सर्वगत परमेश्वर एक है। उसके समान अथवा उससे बड़ा और कोई नहीं है। वह वशी है, क्योंकि सारा जगत् उसके अधीन है। उसके अधीन क्यों है? [इसपर कहते हैं—] क्योंकि वह सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा है। इस प्रकार जो अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेके कारण अपने एक—नित्य एकरस विशुद्धविज्ञानस्वरूप आत्माको नाम-रूप आदि अशुद्ध उपाधिभेदके कारण अपनी सत्तामात्रसे बहुधा—अनेक प्रकारका कर लेता है, उस आत्मस्थ अर्थात् अपने शरीरस्थ हृदयाकाश यानी बुद्धिमें चैतन्यस्वरूपसे अभिव्यक्त हुए [आत्माको जो लोग देखते हैं उन्हींको नित्य सुख प्राप्त होता है]। | | न हि शरीरस्याधारत्वमात्मनः आकाशवदमूर्तत्वात्; आदर्शस्थं | आकाशके समान अमूर्तिमान् होनेसे आत्माका आधार शरीर नहीं है [अर्थात् आत्मा निराधार है]। |