कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३९
| चैतन्यात्मज्योतिःस्वभावं तदेव ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् । तदेवामृतम् अविनाशस्वभावमुच्यते कथ्यते सत्यत्वात् । वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतम् अन्यदतो मर्त्यम् । तस्मिन्परमार्थसत्ये ब्रह्मणि लोका गन्धर्वनगरमरीच्युदकमायासमाः परमार्थदर्शनाभावावगमनाः श्रिता आश्रिताः सर्वे समस्ता उत्पत्तिस्थितिलयेषु । तदु तद्ब्रह्म नात्येति नातिवर्तते मृदादिमिव घटादिकार्यं कश्चन कश्चिदपि विकारः । एतद्वै तत् ॥ १ ॥ | चैतन्यात्मज्योतिःस्वरूप है । वही सबसे महान् होनेके कारण ब्रह्म है। वही सत्यस्वरूप होनेके कारण अमृत अर्थात् अविनाशी स्वभाववाला कहा जाता है । विकार वाणीका विलास और केवल नाममात्र है अतः उस ब्रह्मसे अन्य सब मिथ्या और नाशवान् है । उस परमार्थ-सत्य ब्रह्ममें उत्पत्ति, स्थिति और लयके समय सम्पूर्ण लोक गन्धर्व-नगर, मरीचिका-जल और मायाके समान आश्रित हैं ये परमार्थदर्शन हो जानेपर बाधित हो जानेवाले हैं । जिस प्रकार घट आदि कोई भी कार्य मृत्तिका आदिका अतिक्रमण नहीं कर सकते उस प्रकार कोई भी विकार उस ब्रह्मका अतिक्रमण नहीं कर सकता । निश्चय यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ १ ॥ |
| यद्विज्ञानादमृता भवन्तीत्युच्यते जगतो मूलं तदेव नास्ति ब्रह्मासत एवेदं निःसृतमिति । <br><br> तन्न— | शङ्का—'जिसके ज्ञानसे अमर हो जाते हैं' ऐसा जिसके विषयमें कहा जाता है वह जगत्का मूलभूत ब्रह्म तो वस्तुतः है ही नहीं; यह सब तो असत्से ही प्रादुर्भूत हुआ है । <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है [ क्योंकि—] |