भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 182 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158
१४६कठोपनिषद्[ अध्याय २
गन्तव्यो यस्मात्प्रत्यगात्मा स सर्वस्य। तत्कथमित्युच्यते—चाहिये, क्योंकि वह सभीका अन्तरात्मा है। सो किस प्रकार? इसपर कहते हैं—

इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।
सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥

इन्द्रियोंसे मन पर (उत्कृष्ट) है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे महत्तत्त्व बढ़कर है तथा महत्तत्त्वसे अव्यक्त उत्तम है ॥ ७ ॥

इन्द्रियेभ्यः परं मन इत्यादि। <br><br> अर्थानामिहेन्द्रियसमानजातीयत्वादिन्द्रियग्रहणेनैव ग्रहणम्। <br><br> पूर्ववदन्यत्। सत्त्वशब्दाद्बुद्धिरिहोच्यते ॥ ७ ॥इन्द्रियोंसे मन पर है [तथा मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है] इत्यादि। इन्द्रियोंके सजातीय होनेसे इन्द्रियोंका ग्रहण करनेसे ही विषयोंका भी ग्रहण हो जाता है। अन्य सब पूर्ववत् (कठ० १।३।१० के समान) समझना चाहिये। 'सत्त्व' शब्दसे यहाँ बुद्धि कही गयी है ॥७॥

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥

अव्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है और वह व्यापक तथा अलिङ्ग है; जिसे जानकर मनुष्य मुक्त होता है और अमरत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापको व्यापकस्याप्याकाशादेः सर्वस्य कारणत्वात्। अलिङ्गोअव्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है। वह आकाशादि सम्पूर्ण व्यापक पदार्थोंका भी कारण होनेसे व्यापक है। और अलिङ्ग है—जिसके द्वारा