कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७
| लिङ्ग्यते गम्यते येन तल्लिङ्गं बुद्ध्यादि तदविद्यमानमस्येति सोऽयमलिङ्ग एव। सर्वसंसारधर्मवर्जित इत्येतत्। यं ज्ञात्वा आचार्यतः शास्त्रतश्च मुच्यते जन्तुः अविद्यादिहृदयग्रन्थिभिर्जीवन्नेव पतितेऽपि शरीरेऽमृतत्वं च गच्छति सोऽलिङ्गः परोऽव्यक्तात् पुरुष इति पूर्वेणैव सम्बन्धः ॥८॥ | कोई वस्तु जानी जाती है वह बुद्धि आदि लिङ्ग कहलाते हैं; परन्तु पुरुषमें इनका अभाव है इसलिये यह अलिङ्ग अर्थात् सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित ही है। जिसे आचार्य और शास्त्रद्वारा जानकर पुरुष जीवित रहते हुए ही अविद्या आदि हृदयकी ग्रन्थियोंसे मुक्त हो जाता है तथा शरीरका पतन होनेपर भी अमरत्वको प्राप्त होता है वह पुरुष अलिङ्ग है, और अव्यक्तसे भी पर है—इस प्रकार इसका पूर्ववाक्यसे सम्बन्ध है ॥ ८ ॥ |
| कथं तर्ह्यलिङ्गस्य दर्शनम् उपपद्यत इत्युच्यते— | तो फिर जिसका कोई लिङ्ग (ज्ञापक चिह्न) नहीं है उस [आत्मा] का दर्शन होना किस प्रकार सम्भव है? इसपर कहा जाता है— |
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥
इस आत्माका रूप दृष्टिमें नहीं ठहरता। इसे नेत्रसे कोई भी नहीं देख सकता। यह आत्मा तो मनका नियमन करनेवाली हृदयस्थिता बुद्धिद्वारा मननरूप सम्यग्दर्शनसे प्रकाशित [हुआ ही जाना जा सकता] है। जो इसे [ब्रह्मरूपसे] जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ ९ ॥