कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५
| निर्धारणार्था षष्ठी—पूर्वमस्तीत्ये<br>वोपलब्धस्यात्मनः सत्कार्योपाधि-<br>कृतास्तित्वप्रत्ययेनोपलब्धस्य<br>इत्यर्थः पश्चात्प्रत्यस्तमित-<br>सर्वोपाधिरूप आत्मनस्तत्त्वभावो<br>विदिताविदिताभ्यामन्योऽद्वयस्व-<br>भावो "नेति नेति" (बृ० उ० २ ।<br>३ । ६, ३ । ९ । २६) इति<br>"अस्थूलमण्वह्रस्वम्" (बृ०<br>उ० ३ । ८ । ८) "अदृश्येऽनात्म्ये-<br>ऽनिरुक्तेऽनिलयने" (तै० उ० २ ।<br>७ । १) इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टः<br>प्रसीदत्यभिमुखीभवति आत्म-<br>प्रकाशनाय पूर्वमस्तीत्युपलब्ध-<br>वत इत्येतत् ॥ १३ ॥ | यहाँ 'उभयोः' इस पदमें षष्ठी<br>निर्धारणके लिये है—पहले तो 'है'<br>इस प्रकार उपलब्ध हुए आत्माका<br>अर्थात् सत्कार्यरूप उपाधिके किये<br>हुए अस्तित्व-प्रत्ययसे उपलब्ध हुए<br>आत्माका और फिर जिसकी सम्पूर्ण<br>उपाधि निवृत्त हो गयी है और जो ज्ञात<br>एवं अज्ञातसे भिन्न अद्वितीयस्वरूप<br>है, उस "नेति-नेति"¹ "अस्थूल-<br>मण्वह्रस्वम्"² "अदृश्येऽनात्म्येऽ-<br>निरुक्तेऽनिलयने"³ इत्यादि श्रुतियोंसे<br>निर्दिष्ट आत्माका तत्त्वभाव 'प्रसीदति'—<br>अभिमुख होता है अर्थात् जिसे पहले<br>'है' इस प्रकार आत्माकी उपलब्धि<br>हो गयी है उसे अपना स्वरूप प्रकट<br>करनेके लिये [वह तत्त्वभाव अभि-<br>मुख प्रकाशित होता है] ॥ १३ ॥ |
अमर कब होता है ?
| एवं परमार्थदर्शिनोः— | इस प्रकार परमार्थदर्शीकी— |
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यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥
१. 'यह (स्थूल) नहीं है, यह (सूक्ष्म) नहीं है।'
२. 'अस्थूल, असूक्ष्म, अह्रस्व।'
३. 'अदृश्य (इन्द्रियोंके अविषय) में, अनात्म्य (अहंता-ममताहीन) में, अनिर्वचनीयमें, अनिलयन (आधाररहित) में।'