कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 175, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 175
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६३
| सन्ब्रह्मप्राप्त्या विमृत्युर्भवतीति वाक्यशेषः ॥ १८ ॥ | रहित ) होकर ब्रह्मप्राप्तिद्वारा मृत्युहीन हो जाता है— वह वाक्यशेष है ॥ १८ ॥ |
|---|
| शिष्याचार्ययोः प्रमादकृतान्यायेन विद्याग्रहणप्रतिपादननिमित्तदोषप्रशमनार्थेयं शान्तिरुच्यते— | अब शिष्य और आचार्यके प्रमादकृत अन्यायसे विद्याके ग्रहण और प्रतिपादनमें होनेवाले दोषोंकी निवृत्तिके लिये यह शान्ति कही जाती है— |
|---|
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ १९ ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
परमात्मा हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे। हमारा साथ-साथ पालन करे। हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें। हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो। हम द्वेष न करें ॥१९॥
| सह नावावामवतु पालयतु विद्यास्वरूपप्रकाशनेन । कः ? स एव परमेश्वर उपनिषत्प्रकाशितः । किं च सह नौ भुनक्तु तत्फलप्रकाशनेन नौ पालयतु । सहैवावां विद्याकृतं वीर्यं सामर्थ्यं करवावहै निष्पादयावहै । किं | विद्याके स्वरूपका प्रकाश कर हम दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे। कौन [ रक्षा करे ? इसपर कहते हैं—] वह उपनिषत्प्रकाशित परमेश्वर ही [ हमारी रक्षा करे ]। तथा उसके फलको प्रकाशित कर वह हम दोनोंका साथ-साथ पालन करे। हम अपने विद्याकृत वीर्य—सामर्थ्यको साथ-साथ ही सम्पादित करें—प्राप्त करें। और |
|---|