भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 19

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ


तस्य यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किलास बभूव ॥१॥सारा धन दे डाला। कहते हैं, उस यजमानका नचिकेता नामक एक पुत्र था ॥ १ ॥

तँहकुमारँसन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धा-विवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥

जिस समय दक्षिणाएँ (दक्षिणारूप गौएँ) ले जायी जा रही थीं, उसमें—यद्यपि अभी वह कुमार ही था—श्रद्धा (आस्तिक्यबुद्धि) का आवेश हुआ। वह सोचने लगा ॥ २ ॥

तं ह नचिकेतसं कुमारं प्रथमवयसं सन्तमप्राप्तजननशक्तिं बालमेव श्रद्धास्तिक्यबुद्धिः पितुर्हितकामप्रयुक्ताविवेश प्रविष्टवती। कस्मिन्काल इत्याह—ऋत्विग्भ्यः सदस्येभ्यश्च दक्षिणासु नीयमानासु विभागेनोपनीयमानासु दक्षिणार्थासु गोषु स आविष्टश्रद्धो नचिकेता अमन्यत ॥ २ ॥जो कुमार अर्थात् प्रथम अवस्थामें ही स्थित है और जिसे पुत्रोत्पादनकी शक्ति प्राप्त नहीं हुई उस बालक नचिकेतामें श्रद्धाका अर्थात् पिताकी हितकामनासे प्रयुक्त आस्तिक्य बुद्धिका आवेश—प्रवेश हुआ। किस समय प्रवेश हुआ? इसपर कहते हैं—जिस समय ऋत्विक् और सदस्योंके लिये दक्षिणाएँ लायी जा रही थीं अर्थात् दक्षिणाके लिये विभाग करके गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय नचिकेताने श्रद्धाविष्ट होकर विचार किया ॥२॥

कथमित्युच्यते—किस प्रकार विचार किया सो बतलाते हैं—